Shri Jinendra Stavan Manjari-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 141 of 438
PDF/HTML Page 159 of 456

 

background image
समकित-कैरव-कानने रे, प्रगट्यो परम विकास;
मिथ्यामति-कमलाकरे रे, पाम्यो मुंद्रावास. भ०
करुणा ने माध्यस्थता रे, मुदिता मैत्री चंग;
चार दिशे जस उदयथी रे, वाध्यो अति उछरंग. भ०
शुद्ध क्रिया सवि औषधि रे, पामी रुचिपीयूष;
मुगती फल सफळी फळे रे, सरग कुसुम सजूष. भ०
अकलंकी उदयी जपो रे, अनुपम ए जिनचंद;
उंच भावे प्रभु प्रणमतां रे, नित नित परमानंद. भ०
श्री शांति जिनस्तवन
शांति जिणेसर केसर, अर्चित जगधणी रे....अर्चित०
सेवा कीजे साहिब, नित नित तुम तणी रे... नित०
तुज विण दूजो देव, न कोई दयालुओ रे.....न कोई०
मन-मोहन भवि-बोधन, तूंही मयालुओ रे.... तूंही०
दुरित अपासन शासन, तूं जग पावनो रे....तूं जग०
सुकृतउल्लासन, कर्मनिकासन भावनो रे.....निकासन०
सिंहासन पद्मासन, बेठो जे ठवेरे....बेठो०
जग-भासन पर-शासन, वासन खेपवेरे१.....वासन०
वाणी गंग तरंग, सुरंग ते उच्छलेरे....सुरंग०
नयगमभंगप्रमाण, प्रवाह घणा भलेरे प्रवाह०
१.पेखवेरे.
स्तवन मंजरी ][ १४१