: १५० : आत्मधर्म जेठ : २४७४
तो अखंड एक अरूपी छे अने शरीर तो संयोग जडरूपी पदार्थ छे; बन्ने तद्न भिन्न छे. शरीरना लाख कटका
थाय छतां चेतना तो अखंड ज छे. चेतना अने शरीर कदी पण एक थयां ज नथी. शरीर कपातां जे जीवोने
दुःख थाय छे तेओने शरीर कपायुं ते दुःखनुं कारण नथी पण शरीर साथेनी एकत्वबुद्धि ज अज्ञानीने दुःखनुं
कारण छे; अने साधक जीवोने जो, अल्प दुःख थाय तो तेमने पोताना पुरुषार्थनी नबळाईथी जे राग छे तेने
कारणे दुःख छे. जो शरीर कपाय ते दुःखनुं कारण होय तो आत्माना स्वतंत्र परिणाम ते वखते शुं रह्या? शरीर
कपातुं होय छतां ते ज वखते वीतरागी संतोने दुःख थतुं नथी, पण स्वरूपमां ठरीने केवळज्ञान पामी जाय छे.
माटे शरीर अने आत्मा सदाय जुदां ज छे.
परद्रव्यमां कांई पण करवानी ईच्छानुं
व्यर्थपणुं अने ते छोडवानी प्रेरणा. –
हे जीव, तुं तारा स्वभावने भूलीने पण परद्रव्यमां तो कांईज करवा समर्थ नथी. तुं तारा भावमां
अनुकूळ सामग्री मेळववानी ईच्छा कर, परंतु तारी ईच्छा करवाथी परद्रव्यनो संयोग आवी जाय–एवुं कांई
नथी; एटले तारी परद्रव्यो संबंधी ईच्छा तो क्षणे क्षणे व्यर्थ जाय छे. जे वस्तुनो जे रीते जे वखते जेवो संयोग
वियोग थवानो छे ते वस्तुनो ते रीते ते वखते तेवोज संयोग वियोग थशे. वस्तुना स्वतंत्र परिणमनने कोई
रोकी शके नहि. तुं गमे तेम माथा फोड अने वलखां नांख (संकल्पो विकल्पो कर.) तेथी कांई अनुकूळ सामग्री
आवी जती नथी माटे हे भाई! तुं परद्रव्योमां कांई पण फेरफार करवानी तारी व्यर्थ मान्यता छोड, छोड! केमके
तारी ए मान्यताथी तनेज दुःख थाय छे. परद्रव्योनुं गमे तेम थाय, तेना कर्तापणानी मान्यता छोडीने तुं तारा
स्वभावनी द्रष्टिथी बधानो निर्विकल्पपणे ज्ञाता रहीजा, एज तने शांतिनुं कारण छे परवस्तुना परिणमनमां
“आ आम केम?” एवो विकल्प करवो ते पण तारुं कर्तव्य नथी. आ बधा द्रव्यो पोताना स्वरूपमां परिणमे छे,
कोई द्रव्य पोताना स्वरूपथी बहार परिणमतुं नथी, तुं पण तारा ज्ञान स्वरूपमां ज परिणम. अनादिथी ज्ञान
स्वरूपने भूलीने परना लक्षे विकाररूपे परिणमी रह्यो छो तेज दुःखनुं कारण छे.
आत्मानी भावना के आत्मानुं ध्यान क्यारे थई शके?
स्वभावनुं परिणमन स्वभावनी भावनाने आधीन छे, पण स्वभावनी भावना क्यारे करी शके?
पहेलांं जेवो स्वभाव छे तेवो जाणे तो तेनो महिमा लावीने भावना करे. पण जाण्या वगर भावना कोनी करे?
जेम कोई कहे के पाडानुं ध्यान करो अथवा तो अमेरिका देशनुं चिंतवन करो. परंतु जेणे कदी पाडो जोयो ज न
होय अने अमेरिका देशनुं कांई ज्ञान ज न कर्युं होय ते जीव तेनुं ध्यान के चिंतवन केवी रीते करे? तेम जेणे
सत्समागमे आत्मस्वभाव जाण्योज नथी ते आत्मानी भावना के आत्मानुं ध्यान क्यांथी करी शके? पहेलांं
जिज्ञासु थई, सत्समागम करीने पोताना पुरा स्वभावने जाणे, तो पछी पुरुषार्थ वडे ते पुरा स्वभावनी
भावना करीने पर्यायमां जे कार्य लाववा मागे ते लावी शके छे. पण ज्यांसुधी स्वभावने अने विकारने भिन्न
भिन्न स्वरूपे ओळख्या न होय त्यांसुधी स्वभावने बदले विकारमांज तन्मय थईने तेनी भावना करे, पण
ज्यारे स्वभावने अने विकारने प्रज्ञा छीणी वडे (सम्यग्ज्ञान वडे अर्थात् भेदज्ञान वडे) जुदा जुदा स्वरूपे
ओळखे त्यारे जीव स्वभावनीज भावना करे, पण विकारनी भावना कदी न करे. अने जेवी भावना तेवुं
परिणमन–ए न्याये ते जीवने स्वभावनी भावना होवाथी क्षणे क्षणे शुद्धता वधती जाय छे अने विकारनी
भावना नहि होवाथी विकार क्षणे क्षणे टळतो जाय छे.
आत्मा तरफ प्रेम क्यारे जागे?
जीवे अनादिथी आत्मस्वभाव शुं ते ख्यालमां ज लीधुं नथी तेथी तेने जड शरीरनो अने विकारनो प्रेम
छे पण आत्मानो प्रेम नथी. एक वार पण जो यथार्थ उल्लासथी आत्मस्वभाव प्रत्ये प्रेम जागे तो अल्पकाळे
मुक्तदशा थाय.
प्रश्न:–आत्मा तरफ प्रेम क्यारे जागे?
उत्तर:–आत्मानी ओळखाण करे त्यारे ज तेना तरफ साचो प्रेम जागे. वस्तुना स्वरूपने ओळख्या वगर
तेनो महिमा आवे नहि अने तेना तरफ प्रेम थाय नहि. जेम लौकिकमां कोई संबंधी माणस परदेशमां हंमेशा
सामो मळतो होय, पण ते कोण छे–एनी ज्यां