Atmadharma magazine - Ank 122
(Year 11 - Vir Nirvana Samvat 2480, A.D. 1954)
(Devanagari transliteration).

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[सं...पा...द...की...य]
आजना युवक बंधुओने.....
हे युवान बंधु!
जेमां तारा बुद्धि–बळनो सदुपयोग थाय एवी एक हितकारी वात आजे तारा माटे
अहीं करुं छुं.
हे बंधु!
तुं तारा अत्यार सुधीना जीवनने विचारपूर्वक जो, अने विचार कर के अत्यार सुधीना
जीवनमां तें एवुं शुं कर्युं छे के जेथी तारुं हित थाय....तने शांति थाय....अने तारा जीवननी तने
सफळता लागे!
–जो हजी सुधी तारा जीवनमां तें एवुं कांई पण कर्तव्य न कर्युं होय, ने खोटा मार्गे ज
तें तारुं जीवन वीताव्युं होय,–तो हे बंधु! हवे तुं जाग...जागीने द्रढतापूर्वक एवुं कांईक कार्य
करवानो उद्यमी था के जेथी तारुं हित थाय....अने तारा बुद्धि–बळनी सफळता थाय.
हे युवान बंधु!
हवे तने एम जिज्ञासा थशे के मारे मारा बुद्धि–बळने एवा कया कार्यमां रोकवा के जेथी
मारुं हित थाय ने बुद्धि–बळनी सफळता थाय!!
सांभळ भाई! जो तने हितकार्य करवा माटेनी जिज्ञासा जागी छे तो ते माटेनुं कर्तव्य तने
बतावुं छुं.
हे जिज्ञासु!
प्रथममां प्रथम तुं आस्तिक तो हशे ज. ‘आत्मा छे, आत्माने पूर्वजन्म छे, मोक्ष छे’–
एटलुं तो तुं जरूर मानतो ज हशे. जो अत्यार सुधी आ बाबतमां तें विचार न कर्यो होय तो
हवे आ ज क्षणे तेनो विचार करीने मान.
‘आत्मा छे, पूर्वजन्म छे, मोक्ष छे’–एवी आस्तिक्यता (विश्वास) कर्या पछी तुं तारी
स्वाधीनता जाण....के हुं एक स्वाधीन जीव छुं, मने कोई बनावनार नथी तेम ज मारे कोई
बीजाने आधीन थईने गुण–दोष करवा पडे एम पण नथी; मारा गुण के दोष, पुण्य के पाप,
धर्म के अधर्म, हित के अहित, संसार के मोक्ष, ज्ञान के अज्ञान–ते बधुं मारा ज हाथमां छे.
आवी आत्म–स्वाधीनता जाण्या पछी–‘जीव शुं चीज छे, तेनुं वास्तविक स्वरूप शुं छे? केवा
कर्तव्यथी तेनुं अहित थाय छे ने केवा कर्तव्यथी तेनुं हित थाय?’–ते जाणवानी जरूर छे, अने
तने पण चोक्कस ते जाणवानी जिज्ञासा थशे. तेथी ते हवे पछी कहीश.
* * *
मागशरः २४८० ः २७ः