Atmadharma magazine - Ank 204
(Year 17 - Vir Nirvana Samvat 2486, A.D. 1960)
(Devanagari transliteration).

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आसो: २४८६ : १७ :
ठरवुं –ते एक ज तेने साधवानी रीत छे, बीजुं कोई साधन के बीजी कोई रीत नथी.
आत्माने जाणीने तेनो निर्णय करवो जोईए; आत्माना स्वरूपनो निर्णय न करे ने तेमां शंका
रह्या करे तो आत्माने साधवानो पुरुषार्थ उपडे ज नही, ने निःशंकपणे स्वरूपमां ठरी शके नहि. जे जीव
आत्मस्वरूपने बराबर जाणे छे, ‘आ चैतन्यस्वरूपे अनुभवमां आवे छे ते ज हुं छुं’–एम जाणीने
बराबर निर्णय (श्रद्धा) करे ते जीव निःशंकपणे तेमां ठरीने आत्माने साधे छे आ ज आत्माने
साधवानी रीत छे, बीजी कोई रीते आत्माने सधातो नथी.
जेम राजानुं शरण ल्ये अने दरिद्रता न टळे एम बने नहि, तेम चिदानंद राजाने ओळखीने
तेनुं जेणे शरण लीधुं ते जीव संसारसमुद्रने जरूर तरी जाय छे, तेना दुःख दरिद्रता टळी जाय छे ने ते
परम चैतन्यसुखने पामे छे. माटे आत्मार्थी जीवोए सर्व प्रयत्नथी आ चैतन्यराजाने ओळखीने तेनी
ज सेवा–आराधना करवा योग्य छे.
अंतरमां स्वादना भेदथी भेदज्ञान करवानु्रं छे; ‘आ जे चैतन्य–स्वाद आवे छे ते तो मारा
आत्मानो छे, अने जे आकुळतारूप स्वाद हतो ते मारा आत्मानो स्वाद न हतो पण रागनो स्वाद
हतो; जेटलो चैतन्यस्वाद आवे तेटलो हुं छुं’–आ प्रमाणे अंतरना वेदनथी रागने अने आत्माने जुदा
जाणवा. ज्यां आ प्रमाणे भेदज्ञान कर्युं त्यां ज जीवने एम श्रद्धान् पण थाय छे के आ जे चैतन्यपणे
अनुभवमां आव्यो ते हुं छुं, आ चैतन्यस्वरूप ज मारे सेववा योग्य छे, ते ज मारे ठरवानुं स्थान छे–
आम जाणवुं–श्रद्धवुं ने ठरवुं ते मोक्षनो उपाय छे.
*
आ सूचना जरा लक्षमां लीजिए
आ अंकनी साथे “आत्मधर्म” मासिकनुं १७मुं वर्ष
समाप्त थाय छे.....आवता अंकथी नवुं वर्ष शरू थशे.
आपनुं नवा वर्षनुं लवाजम रूा. ४–०० वहेलासर भरी
आपवा विनंति छे....जेथी आपनो अंक टाईमसर रवाना
थई शके. वी. पी. करवामां घणी मुश्केली पडे छे तेमज
खर्च पण वधारे थाय छे. आ मुश्केली अने खर्च बंनेथी
बचवा आपनुं लवाजम जेम बने तेम वेलासर मोकलीने
व्यवस्थामां सहकार आपशो.
आ उपरांत दरेक गामना मुमुक्षुमंडळने पण खास
सूचना आपवानी के, आपना गामना सर्वे ग्राहकोनुं
लवाजम भेगुं करीने तेनी सूचना सोनगढ जेम बने तेम
वेलासर मोकली आपशो.
लवाजम मोकलवानुं सरनामुं–
श्री दि
जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट
सोनगढ: सौराष्ट्र