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पोतामां जे हितकार्य करवानुं छे ते तो पोतानी सामे जोवाथी ज थाय,
परनी सामे जोवाथी न थाय. परनी सामे जोवाथी तो पोतानुं
हितकार्य चूकी जवाय.
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हे जीव! तारो आत्मा जगतथी जुदो छे, जगतना पदार्थोनो बोजो तारा उपर नथी.
संभाळ.
ते तारुं स्वरूप नथी; माटे निश्चिंत थई निजस्वरूपना चिंतन वडे तारा स्व–कार्यने साध.
तत्पर था.
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सूक्ष्मेऽन्तःसंधिबंधे निपतति रभसात् आत्मकर्मोभयस्य ।
आत्मानं मग्नमंतःस्थिरविशदलसत् धाग्नि चैतन्यपूरे
बंधं चाज्ञानभावे नियमितमभितः कुर्वती भिन्नभिन्नौ ।। १८१।।
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आखा जगत तरफथी पाछो वळीने चैतन्य तरफ वळवाना उद्यमवडे, अत्यंत जागृतीपूर्वक, आत्मा अने
बंधनी संधिनी वच्चे प्रज्ञाछीणी पटकीने मुमुक्षु जीव तेमने जुदा पाडी नांखे छे.–बंनेने जुदा पाडवा माटे
बेनो आश्रय नथी, आश्रय तो एक आत्मानो ज छे; ‘प्रज्ञा’ ज्यां आत्मा तरफ वळीने एकाग्र थई त्यां
बंधथी ते जुदी पडी ज गई; ज्ञान–परिणति अने आत्मानी एकता थई तेमां राग न आव्यो,–तेमां बंधभाव
न आव्यो, ए रीते बंध जुदो ज रही गयो, ने आत्मा बंधनथी छूटी गयो. आ रीते भगवती प्रज्ञा बंधने
छेदीने आत्माने मुक्ति पमाडे छे.
पडीने अंतरमां वळ. रागथी जुदो पडीने जे अंतरमां वळ्यो तेणे आत्मा अने बंध वच्चे प्रज्ञाछीणीने पटकी.
प्रवीण पुरुषो वडे सावधानीथी पटकवामां आवेली आ प्रज्ञाछीणी केवी रीते पडे छे?–शीघ्र पडे छे,–तत्क्षण ज
आत्मा अने बंधनुं भेदज्ञान करती पडे छे; जेवुं ज्ञान अंतरमां वळ्युं के तरत ज बंधने छेदीने आत्माथी जुदो
पाडी नांखे छे. जुओ, आ बंधने छेदवानी छीणी! आ प्रज्ञाछीणी ज मोक्षनुं साधन छे.
अंशने पण आत्मामां भेळवती नथी. आ रीते बंधने सर्व प्रकारे छेदीने आत्माने मोक्ष पमाडनारी आ
‘प्रज्ञा’ ने आचार्यदेवे ‘भगवती’ कहीने तेनो महिमा कर्यो छे.
छोडी दईने पण, आ भगवती प्रज्ञाने अंतरमां पटकीने बंधने छेदी नांख! ‘कोईपण रीते’–एम कहीने कर्म
वगेरे नडशे–ए वात उडाडी दीधी. कोई कहे–कर्म नडे तो?–तो आचार्यदेव कहे छे के अरे जीव! तुं एकवार
प्रज्ञाछीणीने हाथमां तो ले...प्रज्ञाछीणी हाथमां लेतां ज (–एटले के ज्ञानने अंतर्मुख करतां ज) कर्म तो क््यांय
बहार रही जशे ने छेदाई जशे. अहीं तो कहे छे के ‘कर्म नडशे...’ एम याद करे ते खरो मोक्षार्थी नहि, खरो
मोक्षार्थी तो उद्यमपूर्वक प्रज्ञाछीणी वडे भेदज्ञान करीने आत्मा अने बंधने अत्यंत जुदा करी नांखे छे.
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भेदज्ञाननो पुरुषार्थ कर्या वगर केम रहे?–ने आवो मोक्षार्थीजीव बंधना एक कणियाने पण पोताना
स्वरूपमां केम राखे?–न ज राखे. ने भेदज्ञानना कार्यमां ते प्रमाद पण केम करे?–न ज करे. जेम वीजळीना
झबकारे सोय परोववी होय त्यां प्रमाद केम पालवे? तेम अनंतकाळना संसारभ्रमणमां वीजळीना झबकारा
जेवो आ संसारभ्रमणमां वीजळीना झबकारा जेवो आ मनुष्यअवतार, तेमां चैतन्यमां भेदज्ञानरूपी दोरो
परोववा माटे आत्मानी घणी जागृती जोईए. भाई! अनंतकाळे आ चैतन्य भगवानने ओळखवाना ने
मोक्षने साधवाना टाणां आव्या छे, क्षण क्षण लाखेणी जाय छे, आत्मभान वगर उगरवानो कोई आरो
नथी; माटे सर्व उद्यमथी तारा आत्माने भेदज्ञानमां जोड...शूरवीरताथी प्रज्ञाछीणीवडे तारा आत्माना
बंधभावने छेदी नांख. प्रज्ञाछीणी ते बंधने छेदवानुं अमोघशस्त्र छे. प्रज्ञाछीणीने सावधान थईने पटकतां,
एटले के जगतनी अनुकूळतामां अटक्या वगर ने जगतनी प्रतिकूळताथी डर्या वगर ज्ञानने अंतरमां स्व
तरफ वाळतां बंधन बहार रही जाय छे एटले आत्मा बंधनथी छूटी जाय छे. आ रीते बंधनने छेदीने मोक्ष
पामवानुं साधन भगवती प्रज्ञा ज छे.
आराधवो, के जे आराधनाथी जीवने अपूर्व एवुं सम्यक्त्व उत्पन्न थाय छे.” (‘ज्ञानीना
मार्गना आशयने उपदेशनारां वाक््यो’ मांथी)
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– परम शांति दातारी –
तेमने हवे कांई ग्रहवानुं के छोडवानुं रह्युं नथी, तेमने तो पूर्ण समाधि ज छे.
छे ने परभावोने हेय जाण्या छे, तेथी चैतन्यस्वभावनुं ज ग्रहण करीने (–तेमां लीनता करीने) परभावोने
ते छोडता जाय छे; अने तेमने समाधि थती जाय छे.
उपर द्वेष करीने तेने छोडवा मांगे छे. आ रीते मिथ्याद्रष्टिजीव राग–द्वेषथी परने ग्रहवा–छोडवानुं माने छे.
आ रीते मिथ्याअभिप्रायने लीधे तेनो त्याग पण द्वेषगर्भित छे; तेने समाधि थती नथी पण असमाधिज
रहे छे.
मकान तने अनीष्ट छे, के तारो मोह अनीष्ट छे? मोहने तो छोडतो नथी ने मकानने अनीष्ट मानीने
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अज्ञानी बाह्य संयोगनो विश्वास करे छे.
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छेतराता नथी.
राणीओ वगेरे होय छतां तेमां क्यांय मारुं सुख छे एम स्वप्नेय विश्वास करता नथी; ते बधा संयोगो तो
माराथी तद्न जुदा ज छे अने ते संयोगो तरफनी लागणीथी पण मने दुःख छे, तेमां क्यांय मारुं सुख नथी
सुख तो मारा चिदानंदस्वभावमां ज छे; आम स्वभावनो विश्वास करीने धर्मी वारंवार तेने ज स्पर्शे छे,–
तेमां वारंवार डुबकी मारीने शांतरसने वेदे छे. चैतन्यना विश्वासे ज्ञानीना वहाण भवसागरथी तरी जाय
छे–ने मोक्षमां पहोंची जाय छे.
वृद्धावस्था अने आंखोनी पूरी तकलीफ होवा छतां तेओ अवारनवार सोनगढ आवीने
गुरुदेवना प्रवचनोनो लाभ लेता; अने तेमना मनन माटे पू. गुरुदेवे पोताना पावन
हस्ते मंत्र लखी आपेल हतो के “सहज चिदानंद स्वरूप आत्मानुं स्मरण करवुं.” तेओ
प्रसन्नतापूर्वक तेनुं रटण करता. आध्यात्मिक शास्त्रोना स्वाध्याय–श्रवणनो तेमने घणो
प्रेम हतो. तेओ मोरबी मुमुक्षु मंडळना एक वडील तेमज कार्यवाहक कमिटिना सभ्य
हता. आ आत्मधर्मना लेखक ब्र. हरिभाईने परमकृपाळु गुरुदेवनुं चरणसान्निध्य प्राप्त
थवामां प्राप्त थवामां तेमनी प्रेरणा हती. स्वर्गवासना आगला दिवसे मोडी रात सुधी
उत्साहपूर्वक तेमणे तत्त्वश्रवण कर्युं हतुं. तत्त्व समजवानी जिज्ञासामां आगळ वधीने
तेओ पोतानुं कल्याण साधे, अने तेमना कुटुंबीजनो पण तेमना तत्त्वप्रेमनुं अनुकरण
करीने आत्महितना पंथे वळे... ए ज भावना.
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व्यवहारनो निषेध करीने शुद्ध स्वभावना आश्रये मोक्षमार्गने साधे छे. अहा, आचार्यदेवे मोक्षने साधवा
माटे महा सिद्धांत बताव्यो छे के, मोक्षार्थीए जेम परमां एकत्वबुद्धिथी थतुं मिथ्यात्व छोडवा योग्य छे तेम परना
आश्रयथी थतो राग पण छोडवा योग्य ज छे. मोक्षने माटे शुद्धआत्मानो एकनो ज आश्रय करवा योग््य छे.
आत्माने भूलीने, परमां एकत्वबुद्धिथी थतो जे मिथ्या अध्यवसाय ते बंधनुं कारण छे, एटले मोक्षार्थीए
ते छोडवा जेवो छे–एम भगवाननो उपदेश छे. आचार्यदेव कहे छे के, पर साथे एकतारूप अध्यवसाय
भगवाने छोडाव्यो छे ते उपदेशमांथी अमे एवुं तात्पर्य काढीए छीए के परना आश्रये थतो सघळोय
व्यवहारज भगवाने छोडाव्यो छे, केम के ते बंधनुं ज कारण छे. मोक्षनुं कारण तो अबंध स्वभावनो
आश्रय करवो ते ज छे.
द्रव्यना आश्रये थतां पराश्रितभावोमां पण समकित नथी. समकिती तो शुद्ध आत्माना आश्रये थता
सम्यक्त्वादि निर्मळभावोमां छे. पर द्रव्यने अने परभावो तो तेणे पोताना स्वभावथी जुदा जाण्या छे तो
तेमां समकिती केम होय? रागना के परना स्वामीपणे समकितीने ओळखे तो तेणे खरेखर समकितीने
ओळख्या ज नथी.
स्वद्रव्यनो आश्रय छे?–ना; जेम परने कारणे स्व नथी तेम पराश्रयने कारणे स्वाश्रय नथी, एटले
व्यवहारने कारणे निश्चय नथी. समकिती जाणे छे के–जेम परद्रव्यथी मारो आत्मा जुदो छे तेम पराश्रित एवा
रागादि भावोथी पण मारो आत्मा जुदो ज छे.–आ रीते समकिती–धर्मात्मा व्यवहारथी मुक्त छे, छूटो छे.
स्वाश्रये जे साधकभाव थयो छे–निर्मळभाव थयो छे ते तो व्यवहारना पराश्रयभावथी (–बाधकभावथी)
जुदो ज वर्ते छे. स्वाश्रयभावनी धारा निर्मळपणे मोक्षमार्गे चाली जाय छे, ने जेटलो पराश्रित भाव छे ते
बधोय सम्यग्द्रष्टिना विषयथी बहार छे. पराश्रये थतो भाव तो बंधनुं कारण होवाथी बाधक छे. ते
बाधकभावमां जे एकपणे वर्ते ते जीव मोक्षनो साधक केम होय? अने जे मोक्षनो साधक होय ते तेमां (–
बाधकभावमां) एकपणे केम वर्ते?– माटे मोक्षना साधक ज्ञानीधर्मात्मा पराश्रित व्यवहारथी मुक्त ज छे,
एटले शुद्ध स्वभावना आश्रय वडे ते व्यवहारने छोडीने मुक्ति पामे छे. आ ज मोक्षने साधवानी
समकितीनी कळा छे. आवी कळा द्वारा ज समकितीनी खरी ओळखाण थाय छे.
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ते चैतन्यप्रकाशी–आत्मा पदार्थोने जाणे छे पण करतो नथी.
जेनी द्रष्टिमां आवो चैतन्यप्रकाशी आत्मा आव्यो ते जीव चैतन्यथी बाह्य एवा रागादि परभावोनो
–ज्ञानभावे ते पोतानी ज्ञान–आनंद दशानो ज कर्ताभोक्ता छे, अने
–अज्ञानदशामां ते पोताना राग के हर्षादिनो कर्ताभोक्ता पोते ज छे.
कोई अज्ञानी जीव पोताना ज्ञानस्वभावनी सन्मुख थईने निर्मळज्ञानभावरूपे तो परिणमतो नथी,
रागनो अकर्ता ज छे, ने कर्म ज राग करावे छे.–तो एवा जीवने आचार्यदेव युक्तिथी वस्तुस्थिति समजावे छे
के :–
अनेकान्तमयश्रुतिनो (–जिनवाणीनो) तारा उपर कोप थयो, अर्थात् तारी मान्यता जिनवाणीथी विरुद्ध
थई, –एटले श्रुतिनी तारा उपर प्रसन्नता न थई, तारुं श्रुतज्ञान सम्यक् न थयुं पण कुश्रुत थयुं.
आत्मा रागनो अकर्ता, ज्ञान–
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के आत्मा कथंचित् कर्ता छे.
ए ज जीवहिंसानुं मोटुं पाप छे.
निर्मळभावो प्रगट थतां तेमां रागनुं पण अकर्तापणुं थशे.
छे, पण जडकर्म रागादि करावे छे एम मानता नथी.
विकारनो अकर्ता;
ने परनो तो अकर्ता
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