Atmadharma magazine - Ank 207
(Year 18 - Vir Nirvana Samvat 2487, A.D. 1961)
(Devanagari transliteration).

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ATMADHARMA REGD. NO. 5669
शुद्धात्मानी प्राप्ति माटे कटिबद्ध
अरे जीवो? आत्मानुं स्वरूप साधवामां क््यांय प्रतिबंध करशो नहि. आत्मानुं
स्वरूप साधवा माटे तमारो पुरुषार्थ उपाडीने चाल्या आवो स्वभाव तरफ.
चिदानंदस्वरूप आत्मानुं जेने भान थयुं छे, सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान उपरांत सम्यक्चारित्रदशा
पण जेने प्रगटी छे–एवा संतमुनिवरो पूर्ण शुद्धात्मानी प्राप्ति माटे शुभपरिणतिने पण छोडवा उद्यमी छे.
शुभपरिणतिने वश रहेवुं–ते पण मोहनो ज प्रकार छे; ज्यांसुधी मोह होय त्यांसुधी पूर्ण शुद्धआत्मानी प्राप्ति
क््यांथी थाय? आम समजीने मुनिवरो शुद्धात्मानी प्राप्ति अर्थे मोहने मूळमांथी ऊखेडी नांखवा माटे सर्व
उद्यमथी कटिबद्ध थाय छे, शुभपरिणतिने पण छेदीने शुद्धात्मा ठरे छे.
आचार्यदेव समजावे छे के अरे जीव! मुनिवरोनी शुभपरिणति ते पण मोहनो प्रकार छे, तो बीजा
अज्ञानीओना शुभनी शी वात? शुद्धात्मानी प्राप्ति माटे मुनिवरो तो शुभने पण छोडवानो उद्यम करे छे,
अने तुं ते शुभवडे शुद्धनी प्राप्ति करवानुं माने,–तो ते मुनिओ करता तारी मान्यता विरुद्ध थई. जेना
अभिप्रायमां ज शुभरागनो आदर छे ते तो मोहने पुष्ट करे छे तेने तो महादुःखनुं संकट एवुं ने एवुं छे.
अहीं तो कहे छे के मोक्षमार्गने आराधनारा संतोने पण वच्चे जेटली शुभपरिणति आवे तेटलुं दुःख–संकट छे.
शुद्धोपयोग ज सुखनुं धाम छे–माटे हे भाई! तुं शुद्धस्वभाव तरफ सावधान था. कम्मर कसीने तुं मोहने
जीतवानो उद्यम कर शुद्धोपयोग प्रत्ये ज उत्साह अने प्रयत्न कर. ते शुद्धोपयोग वडे ज परमआनंदरूप
शुद्धात्मानी प्राप्ति थाय छे.
शुद्धात्मानी प्राप्ति करवा माटे मोहनी सेनाने जीतवा जेणे कमर कसी छे–पुरुषार्थ उपाड्यो छे–ते जीव
मोहने कई रीते जीवे छे? तेनुं अलौकिक वर्णन आचार्यदेवे आ प्रवचनसारनी ८०–८१–८र मी गाथामां कर्युं छे.
शुद्धात्माने प्राप्त करवा माटे कमर कसीने जेणे पुरुषार्थ उपाड्या छे ते जीव प्रथम तो सर्व प्रकारे शुद्ध
एवा भगवान अरंहतदेवना स्वरूपनो निर्णय करे छे. द्रव्यथी शुद्ध, गुणथी शुद्ध, ने पर्यायथी पण शुद्ध–एवा
अरहंतदेवनुं स्वरूप ओळखतां आत्मानुं शुद्ध स्वरूप पण ते जीव ओळखी ले छे. सर्वप्रकारे शुद्ध एवा
भगवान सर्वज्ञदेवने ओळखे अने शुद्धात्मानी प्राप्तिनो पुरुषार्थ न ऊपडे एम बने ज नहीं. अरे जोवो!
आत्माना स्वरूपने साधवामां क्यांय प्रतिबंध करशो नहि. तमारो पुरुषार्थ उपाडीने चाल्या जाओ–आत्माना
स्वभावमां! वच्चे रागना प्रतिबंधमां अटकशो नहि, भवस्थितिनुं के काळनुं नाम लईने पुरुषार्थमां प्रतिबंध
करशो नहि स्वभावनो पुरुषार्थ करनारने भवस्थिति पाकी ज गई छे, तेनो मोक्षनो काळ नजीक आवी ज
गयो छे आमां जे जीव शंका करे तेणे मोक्षनो पुरुषार्थ उपड्यो ज नथी, अने सर्वज्ञभगवानने पण तेने
ओळख्या नथी. भगवाने पोते पुरुषार्थवडे भवने छेदी नांख्या छे, ने भगवाननी वाणी पण भवछेदक छे,
भवना छेदनो पुरुषार्थ करवानो उपदेश छे. आत्माना स्वभावनो पुरुषार्थ करे अने भवनो छेद न थाय एम
बने ज नहीं.
प्रवचनसार गाथा ७९–८० उपरना प्रवचनमांथी
श्री दिगंबरजैन स्वाध्याय मंदिरट्रस्ट वती मुद्रक अने प्रकाशक: हरिलाल देवचंद शेठ: आनंद प्रिं. प्रेस, भावनगर.