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शुभपरिणतिने वश रहेवुं–ते पण मोहनो ज प्रकार छे; ज्यांसुधी मोह होय त्यांसुधी पूर्ण शुद्धआत्मानी प्राप्ति
क््यांथी थाय? आम समजीने मुनिवरो शुद्धात्मानी प्राप्ति अर्थे मोहने मूळमांथी ऊखेडी नांखवा माटे सर्व
उद्यमथी कटिबद्ध थाय छे, शुभपरिणतिने पण छेदीने शुद्धात्मा ठरे छे.
अने तुं ते शुभवडे शुद्धनी प्राप्ति करवानुं माने,–तो ते मुनिओ करता तारी मान्यता विरुद्ध थई. जेना
अभिप्रायमां ज शुभरागनो आदर छे ते तो मोहने पुष्ट करे छे तेने तो महादुःखनुं संकट एवुं ने एवुं छे.
अहीं तो कहे छे के मोक्षमार्गने आराधनारा संतोने पण वच्चे जेटली शुभपरिणति आवे तेटलुं दुःख–संकट छे.
शुद्धोपयोग ज सुखनुं धाम छे–माटे हे भाई! तुं शुद्धस्वभाव तरफ सावधान था. कम्मर कसीने तुं मोहने
जीतवानो उद्यम कर शुद्धोपयोग प्रत्ये ज उत्साह अने प्रयत्न कर. ते शुद्धोपयोग वडे ज परमआनंदरूप
शुद्धात्मानी प्राप्ति थाय छे.
अरहंतदेवनुं स्वरूप ओळखतां आत्मानुं शुद्ध स्वरूप पण ते जीव ओळखी ले छे. सर्वप्रकारे शुद्ध एवा
भगवान सर्वज्ञदेवने ओळखे अने शुद्धात्मानी प्राप्तिनो पुरुषार्थ न ऊपडे एम बने ज नहीं. अरे जोवो!
आत्माना स्वरूपने साधवामां क्यांय प्रतिबंध करशो नहि. तमारो पुरुषार्थ उपाडीने चाल्या जाओ–आत्माना
स्वभावमां! वच्चे रागना प्रतिबंधमां अटकशो नहि, भवस्थितिनुं के काळनुं नाम लईने पुरुषार्थमां प्रतिबंध
करशो नहि स्वभावनो पुरुषार्थ करनारने भवस्थिति पाकी ज गई छे, तेनो मोक्षनो काळ नजीक आवी ज
गयो छे आमां जे जीव शंका करे तेणे मोक्षनो पुरुषार्थ उपड्यो ज नथी, अने सर्वज्ञभगवानने पण तेने
ओळख्या नथी. भगवाने पोते पुरुषार्थवडे भवने छेदी नांख्या छे, ने भगवाननी वाणी पण भवछेदक छे,
भवना छेदनो पुरुषार्थ करवानो उपदेश छे. आत्माना स्वभावनो पुरुषार्थ करे अने भवनो छेद न थाय एम
बने ज नहीं.