सुखीदुःखी थई रह्यो छे. आ रीते आत्मानी सुध–बुध खोईने जीव पोतानुं सर्वस्व
लूंटावी रह्यो छे. माटे हे जीव! तुं ए मिथ्यात्वादिने छोड....जेथी तने शिवमार्गनुं ग्रहण
थाय.
तब कछु बनहिं उपाय कर्म चोर आवत रूके.
अरू महाव्रत पन समिति गुप्ति तीन–दश वृष भावसों;
परिषह सहन अरू भावना चित चिंतये नित ही सही,
तातें जु होवे कर्म संवर यही जिनधुनिमें कही.
परिषहसहन, वैराग्य भावनाओनुं निरंतर चिंतन वगेरेथी कर्मोनो संवर थाय छे; माटे
हे जीव! तेनो उपाय कर्तव्य छे.
या विधि विन नीकसे नहीं पैठे पूरव चोर.
बारह विधि तप अग्नि जलाये कर्मचोर जलजांही;
उदयभोग सविपाक निर्जरा पके आम तरू डाली,
तपसों हवै अविपाक पकावे पाल विषे जिम माली.
प्रबल पंच ईन्द्रिविजय, धार निर्जरा सार.