Atmadharma magazine - Ank 248
(Year 21 - Vir Nirvana Samvat 2490, A.D. 1964)
(Devanagari transliteration).

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: २८ : आत्मधर्म : जेठ : २४९०
[मिथ्यात्वरूप मोहनिंद्राना जोरथी, तथा अव्रत–प्रमाद वगेरेथी जीव संसारमां
सदा घूमी रह्यो छे, ने शुभाशुभ कर्मनो आस्रव करी रह्यो छे, ते कर्मना उदयथी
सुखीदुःखी थई रह्यो छे. आ रीते आत्मानी सुध–बुध खोईने जीव पोतानुं सर्वस्व
लूंटावी रह्यो छे. माटे हे जीव! तुं ए मिथ्यात्वादिने छोड....जेथी तने शिवमार्गनुं ग्रहण
थाय.
]
(८) सवर भवन
सत गुरू देय जगाय मोहनींद जब उपशमें,
तब कछु बनहिं उपाय कर्म चोर आवत रूके.
रूके तबही कर्म आस्रव किये संवर चावसों
अरू महाव्रत पन समिति गुप्ति तीन–दश वृष भावसों;
परिषह सहन अरू भावना चित चिंतये नित ही सही,
तातें जु होवे कर्म संवर यही जिनधुनिमें कही.
[ज्यारे सद्गुरु जगाडे अने जीवनी मोहनिंद उपशमे, त्यारे सम्यक्त्वादिरूप
संवरना प्रेमथी ते कर्मना आस्रवना रोके. अने महाव्रत–समिति–गुप्ति, दशधर्म,
परिषहसहन, वैराग्य भावनाओनुं निरंतर चिंतन वगेरेथी कर्मोनो संवर थाय छे; माटे
हे जीव! तेनो उपाय कर्तव्य छे.
]
(९) निर्जरा भावना
ज्ञानदीप तप तेलघर घर शोधे भ्रम छोड,
या विधि विन नीकसे नहीं पैठे पूरव चोर.
पैठे पूरव चोर कर्म सब रहे देह घरमांही
बारह विधि तप अग्नि जलाये कर्मचोर जलजांही;
उदयभोग सविपाक निर्जरा पके आम तरू डाली,
तपसों हवै अविपाक पकावे पाल विषे जिम माली.
[सम्यग्ज्ञानरूपी दीपक अने तपरूपी तेल वडे अंतरमां शोधतां पूर्वे प्रवेशेला
छे.]
पंचमहाव्रत संचरण, समिति पंच परकार
प्रबल पंच ईन्द्रिविजय, धार निर्जरा सार.