Atmadharma magazine - Ank 272
(Year 23 - Vir Nirvana Samvat 2492, A.D. 1966)
(Devanagari transliteration).

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: जेठ : २४९२ आत्मधर्म : ३३ :
विविधवचनामृत
[आत्मधर्मनो चालु विभाग: लेखांक १८]
(२४१) भूख्याने अमृत मळे तो......
जेम, घणा दिवसना भूख्या–तरस्या मनुष्यने मनपसंद भोजन ने ठंडा पाणी
पीवा मळे तो केटली होंसथी ते तेने खावा मांडे तथा केटली होंसथी पाणी पीए?
तेम अनंत–अनंत काळथी भवभ्रमणमां रखडी रखडीने मोहथी आकृळ–व्याकुळ
संतप्त जीवने सत्समागम अने जिनवचनरूपी परम अमृत मळ्‌युं; अमृत तेने कहेवाय
के जेनी प्राप्ति पछी फरीने मृत्यु न थाय, सिद्धदशा थाय. आवा जिनवचनरूपी अमृत
अने श्रुतज्ञानरूपी अमृत मळे तो जिज्ञासु जीव केटली धगशथी तेनुं पान करे?
जिज्ञासु कहे छे के अनाज अने पाणी ए मारो साचो खोराक नथी, मारो साचो
खोराक तो अंतरना भावश्रुतना घोलनपूर्वक जिनवाणीनुं श्रवण–मनन–अनुभवन
करवुं ते छे.
(२४२) मुमुक्षुनी जवाबदारी
हे जीव! तारा स्वभावने साधवानी साची जवाबदारी तुं ले. संसारना बाह्य
कार्योनी जवाबदारी तारा माथेथी उतारी नांख. संसारमां राष्ट्रना, कुटुंबना, शरीरना के
रागना कार्योनी जवाबदारी तुं तारा उपर मानी रह्यो छो, पण ते कोई कार्यनी
जवाबदारी तारा उपर नथी, ए कोई तारुं कर्तव्य नथी. जगतना पदार्थोमां थवा योग्य
कार्यो एनी मेळे थया करे छे. तुं मफतनो तेनी जवाबदारी (–कर्तापणानुं अभिमान)
माथे लईने तारा आत्मानी साची जवाबदारी (ज्ञाताभाव) ने भूली जाय छे. माटे
जगतना कार्योनी चिंता छोडी–तेनाथी उदासीन थई, तारा निजस्वभावना कार्यने
संभाळ. संसारकार्योने छोडी–छोडीने अनंता जीवो सिद्धिमां सिधाव्या, छतां जगतनुं
कोई कार्य अटकी नथी रह्युं; अने अज्ञानीए अनंतकाळ संसारना कार्योमां गाळ्‌यो छतां
संसारना कार्य पूरां नथी थया. माटे हे