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समयसारना पहेलां ज पाठमां आचार्यदेव कहे छे के
हे भव्य! तारा आत्मामां सिद्धपणुं स्थाप. सिद्ध
भगवंतोने आदर्शरूपे राखीने नक्क्ी कर के ‘जेवा
सिद्ध तेवो हुं. ’ –आवा लक्षपूर्वक समयसार सांभळतां
तने तारो अद्भुत आत्मवैभव तारामां देखाशे.
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पण आत्माने स्पर्शीने तेना भावो खोले छे...ने आत्मार्थीना पुरुषार्थने आत्मा
ने कथानुयोगमां पण आत्मसाधनानी ज कथाओ गुंथायेली छे. आत्माने
महत्ता देखे छे. गुरुदेवनुं प्रवचन आपणने शास्त्रोमां रहेला सन्तोना हार्द सुधी
वांचको दर महिने करी रह्या छे....आप पण आत्मधर्म मंगावीने तेनुं रसस्वादन
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कुंदकुंद–कहान जैनशास्त्रमाळा’ ना प्रकाशनोमां “आत्मवैभव” नामना
१०८ नंबरना प्रकाशन द्वारा आ शास्त्रमाळाना १०८ मणका पूरा थाय
छे. गुरुदेवना प्रतापे जिज्ञासुओने आत्माभिमुख करतुं जे विपुल
वीतरागी साहित्य आजे प्रकाशमां आवी रह्युं छे ते महान प्रभावनानुं
कारण छे. एक तरफ आत्मधर्मनुं नियमित प्रकाशन, अने बीजी तरफ
विविध प्रकारना साहित्यनुं गुजराती–हिंदीमां प्रकाशन, एना द्वारा
भारतभरमां प्रभावना विस्तरी रही छे. भारतमां ज नहि परदेशमां पण
हजारो पुस्तको अनेक जिज्ञासुओ उत्साहथी मंगावे छे ने वांचे छे.
शास्त्रमाळाना १०८ मणकानी पूर्णताना प्रसंगे तेमां प्रकाशित पुस्तकोनो
परिचय अहीं टूंकमां क्रमेक्रमे आपीशुं. (सं.)
छीए. ए जिनवाणीना दातार वीतरागी सन्तोने नमस्कार करीए छीए.
छे के प्रत्यक्ष ज्ञानी–सन्तोनो परिचय ने तेमनी पासेथी सीधुं श्रवण ए मुख्य वस्तु छे;
ज्ञानी पासेथी शास्त्रना रहस्य समजवानी चावी मेळव्या पछी जे शास्त्रस्वाध्यायादि
करवामां आवे ते विशेष लाभनुं कारण थाय छे. आवा लक्षपूर्वक जिज्ञासु जीवोए दररोज
शांतचित्ते अवश्य शास्त्रस्वाध्याय करवी जोईए.
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पहेलांं सं. १९९९ मां आत्मसिद्धिप्रवचनो वगेरे पुस्तकोनुं प्रकाशन थयेलुं, पण
शास्त्रमाळानी शरूआत सं. २००१ मां थई. ‘समयसार–प्रवचनो’ पहेला पुस्तकमां गाथा
१ थी १३ सुधीनां प्रवचनो छे. किंमत रूा. चार समयसार–प्रवचनो (पुस्तक बीजुं) गाथा
१४ थी २२ तथा गा. ३१ उपरनां प्रवचनो: (अप्राप्त)
छे के तेमां छपायेलां प्रवचनो पू. बेनश्री अने पू. बेन (बंने बहेनो) द्वारा लखायेलां छे;
ने अंतरमां भेदज्ञानना उद्यम माटेनी उत्तम प्रेरणा आपे छे. दरेकनी किंमत रूा. त्रण.
छपायेल छे. जिनेन्द्रपूजननो प्रचार दिनेदिने केवो वृद्धिगत थयो–तेनो ख्याल आ
जिनेन्द्रपूजासंग्रह उपरथी आवे छे. किंमत बे रूपिया.
प्रवचनसार गा. ८६ मां कह्युं छे.
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थाय छे. मोटा–नाना सौने उपयोगी आ पुस्तकमां चारगतिनां दुःखो, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान,
सम्यक्चारित्ररूप मोक्षमार्ग वगेरेनुं सुगम शैलिथी कथन छे. गुजरातीमां चोथी आवृत्ति छपायेल
छे: पृ: १७२ किंमत ०–८० (हिंदीमां पण छहढाळानी अनेक आवृत्ति छपायेल छे. छेल्ली सचित्र
आवृत्ति किंमत एक रूपियो.)
(प) समवसरण–स्तुति: आमां स्तुतिरूपे समवसरणनुं भावभीनुं वर्णन छे.
सीमंधरभगवानना समवसरणनी रचनानो नमूनो सोनगढमां छे. तेमां दरेक महिनानी वद छठ्ठे
सामूहिक भक्तिमां आ समवसरणस्तुति गवाय छे. पू. बेनश्री–बेन द्वारा आ स्तुति गवाती
होय त्यारे विदेहीनाथना समवसरणनो ताद्रशचितार खडो थाय छे ने श्रोताओ भक्तिमां
एकतान थईने झूमी ऊठे छे. आ पुस्तकमां कुंदकुंदाचार्यदेवनी पण अनेक स्तुतिओ छे. पुस्तकनी
अनेक आवृत्तिओ छपाणी छे. किंमत – ०–३प
(६) अमृतझरणां: जेनुं बीजुं नाम छे ‘मुक्तिनो मार्ग.’ पं भागचंदजी छाजेडे ‘सत्तास्वरूप’
नामनुं पुस्तक बनाव्युं छे तेमां सर्वज्ञनुं स्वरूप वगेरेनुं सुंदर वर्णन छे. तेना उपर सं. २००० मां
पू. गुरुदेवे खास प्रवचनो करेला, ते आ पुस्तकमां छपायेल छे. जिज्ञासुओने देव–गुरु–धर्मनुं
स्वरूप अत्यंत सुगम शैलिथी समजाय, ने श्रद्धा–भक्तिनुं चानक चडे एवुं आ पुस्तक छे.
गुजरातीमां त्रण आवृत्ति छपायेल छे. किंमत– ०–७प
(हिन्दीमां पण ‘मुक्तिका मार्ग’ नी छ आवृत्ति छपायेल छे. हिंदी–गुजराती मळीने कुल त्रीस
हजार जेटला पुस्तको छपाया छे.
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बहेनो उपशांतभावथी गवडावता होय त्यारे जिनमंदिरनुं वातावरण मुमुक्षुभक्तोना
छपाया छे.
गाथा (३८ थी ४२) उपरनां प्रवचनो छे. किं. १–६२
(१२) आत्मसिद्धि–सार्थ: आत्मसिद्धि अर्थ सहित, जिज्ञासुओने स्वाध्याय माटे उपयोगी छे.
सोनगढ (सौराष्ट्र)
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बीजी आवृत्ति किं: १–प०
सरस वर्णन छे. नानकडुं सुंदर पुस्तक दरेक जिज्ञासुने उपयोगी छे; बीजुं पुस्तक
‘सत्तास्वरूप’ पं. श्री भागचंदजी छाजेड रचित छे, तेमां सर्वज्ञसत्तानी सिद्धि करीने ए
बताव्युं छे के सर्वज्ञदेवनो भक्त केवो होय? सर्वज्ञनी ओळखाण क्यारे थई कहेवाय?
ने जैनपणुं केवुं होय? आ पुस्तक दरेक जिज्ञासुने तत्त्वनिर्णय माटे उपयोगी छे. बंने
पुस्तकनी अनेक आवृत्ति छपाई गई छे. किंमत–एक रूपीओ.
आत्मभावना माटे उपयोगी छे. सचित्र पुस्तक किंमत १–प०
अने नानामोटा सौने उपयोगी एवुं आ शास्त्र पाठशाळाओनुं पाठ्यपुस्तक छे; आ
शास्त्र उपर अनेक धूरंधर आचार्योए जे विशाळ टीकाओ रची छे; ते टीकाओना
सारनो संग्रह आ पुस्तकमां छे: दरेक अभ्यासीओने उपयोगी छे. आवृत्ति: त्रीजी पृ.
९१प किं. ४ हिन्दी आवृत्ति त्रीजी–पृ. ९०० मूल्य रूा. पांच.
(१९)
स्वरूप समजवा माटे सरस जागृती करी छे. उपादान अने निमित्त ए बंने स्वतंत्र
होवा छतां, तेमने पराधीन मानवा ते तत्त्वनी मूळमां ज भूल छे. एम बतावीने,
सत्यस्वरूपनी समजणद्वारा ते भूल टाळवानुं आ पुस्तक बतावे छे. उपादान अने
निमित्त ए बंनेनी सामसामी अनेक दलीलोथी संवादरूपे होवाथी आ पुस्तकनी
शैली रोचक छे. हिंदी–गुजरातीमां घणी नकलो प्रगट थई चूकी छे.
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पाठशाळानुं पाठ्यपुस्तक छे, ने नानामोटा सौने उपयोग छे: तेनो गुजराती अनुवाद
अर्थसहित (अप्राप्त) हिन्दी आवृत्ति रूा. १)
जैनरामायण छे. तेमांथी संक्षिप्त करीने नानुं पद्मपुराण थयुं हतुं. तेनुं आ गुजराती
भाषांतर छे. बाळकोने खास उपयोगी छे; राम अने सीताजी तेमज रावण वगेरे
संबंधी अनेक भ्रांत धारणाओ दूर करे छे. गुजरातीमां मळतुं नथी. (हिंदीमां सुरतथी
मळे छे. (किं. पचास पैसा.)
(समयसार उपरांत प्रवचनसार, नियमसार ने पंचास्तिकायना पण हरिगीतमां
पद्यानुवाद छपाया छे. अवारनवार ते दरेकनी पण समूहस्वाध्याय थाय छे.)
स्वाध्याय माटेना आ बधा पुस्तकोनो संग्रह “शास्त्रस्वाध्याय” नामना पुस्तकरूपे
प्रगट थयेल छे. किंमत १–प०
(२४) प्रतिक्रमण: प्रतिक्रमणनुं साचुं स्वरूप समजावतुं आ एक संकलन छे. पर्युषण वगेरेना
छपायेल छे. किंमत पचास पैसा.
हिंदी फरीने पांच हजार छपाणी छे, –जिज्ञासुओने भेट आपवा माटे.)
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वखत मळे छे, ऊंघवानो ने खावानो वखत तो मळे छे! ने आत्माना विचार माटे वखत नथी
मळतो? आत्मानी खरी खटक होय तो तेने माटे बीजानो रस छोडीने वखत काढ्या वगर रहे ज
नहीं. भाई! आवा अवसर फरीफरी नथी मळता. आत्मानो जेवो स्वभाव छे तेवो समजीने
श्रद्धा करवी, तेनो रस करवो तेमां ज सुख छे, बाकी तो संसारना बाह्य भावोमां दुःख दुःख ने
दुःख ज छे. अहा, जे आत्मस्वभावनी प्रेमथी वात करतां पण आनंद आवे तेना साक्षात्
अनुभवना आनंदनी शी वात! माटे हे जीव! दुःखथी छूटवा ने आनंदित थवा तुं आत्मामां ‘हुं
शुद्ध चिंदानंद छुं’ –एवी श्रद्धाना संस्कार पाड. जेणे साची श्रद्धा करी तेणे आत्मामां मोक्षना
मंगल स्थंभ रोप्या. सम्यग्दर्शन कर्युं ते अल्पकाळमां मोक्षपुरीनो नाथ थशे.
कठण लागे छे, ने बाह्य विषयोनी रुचि छे एटले ते सहेलुं लागे छे. –ए तो जीवनी रुचिनो ज
दोष छे. रुचि करे तो आत्मानी समजण सुगम छे. आ काळे स्वरूपनो अनुभव कठण छे–एम
कहीने जे तेनी रुचि छोडी दे छे ते बहिरात्मा छे. जेने जेनी रुचि अने जरूरीयात लागे तेनी
प्राप्तिमां तेनो प्रयत्न वळे ज. जेने आत्मानी रुचि खरेखर होय तेनो प्रयत्न आत्मा तरफ वळे
ज. बाकी रुचि करे नहि, ज्ञान करे नहि अने रागने धर्मनुं नाम आपी द्ये तेथी ते राग कांई धर्म
न थई जाय. कडवा करीयाताने कोई ‘साकर’ नुं नाम आपीने खाय तोपण ते कडवुं ज लागे;
तेम रागने कोई धर्म माने तोपण ते रागनुं फळ तो संसार ज आवे, तेनाथी कांई मोक्ष न थाय.
जेवो पुरुषार्थ करे तेवुं कार्य प्रगटे. स्वभावनो पुरुषार्थ करतां सम्यग्दर्शनादि स्वभावकार्य प्रगटे;
अने रागनो पुरुषार्थ करतां पुण्य–पाप थाय पण धर्म न थाय.
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द्रष्टिमां लईने तेनी सन्मुख परिणमे ते जीवने अल्पकाळमां मोक्षप्राप्ति थशे थशे ने थशे.
अने तेमना पछी एकहजार वर्षे अमृतचंद्राचार्य थया तेमणे पण ‘भवसमुद्रनो किनारो जेमने
नीकट छे एवा कुंदकुंदाचार्यदेव’ –एम कहीने तेमना हृदयनुं रहस्य टीकामां खोल्युं छे. अहा, ए
वीतरागी दिगंबर सन्तोनो मुमुक्षु जीवो उपर मोटो उपकार छे.
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आवे त्यांसुधी सम्यक्त्व थाय नहि ने विकल्पनुं कर्तृत्व छूटे नहीं. विकल्पनो खखडाट लईने अंदर
शांत–समरसभावमां जई शकाय
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नथी.
विकल्पमांथी उपयोगने हठावे तो ज आत्मवस्तु समजाय ने अनुभवमां आवे.
अहा, ईन्द्रोए जेमना चारित्रनो महोत्सव कर्यो–एनी शी वात! त्रण ज्ञान तो जन्मथी ज लाव्या
हता, ने आजे (कारतक वद दशमे, शास्त्रीय भाषामां मागशर वद दशमे) चोथुं ज्ञान
आत्मध्यानमां प्रगट थयुं; शुद्धोपयोगरूप महा समरसभाव प्रगट थयो. सम्यग्दर्शनरूप समरस
तो पहेलेथी हतो ज, आजे तो चारित्ररूपी महान समरस प्रगट्यो.
ने पर्याय बंने समरसपणे अनुभवाय छे. जेवी वस्तु हती. तेवी पर्याय थईने अनुभवमां
आवी. शुद्ध परिणामद्वारा शुद्धद्रव्य नक्क्ी थाय छे. वीतरागमार्गनो आ रस छे. आमां पर्याये
‘वीतराग’ थईने वीतरागस्वरूपनां दर्शन कर्या. रागवडे वीतरागस्वरूप अनुभवमां न आवे.
द्रव्य ने पर्याय बंने समरस एकरूप थाय त्यारे शुद्ध वस्तु अनुभवमां आवे छे, तेमां विकल्पो
रहेता नथी.
थई जाय छे; आत्मतत्त्व महा आनंदसहित स्फूरायमान थाय छे. ते आनंदमां बीजो कोई विकल्प
रहेतो नथी. आवुं जे चैतन्यतत्त्व ते हुं छुं–एम धर्मी अनुभवे छे.
विकल्परूप दुःख केम रहे?
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जगत छे–एम तेना अस्तित्वनो निर्णय आत्माना अस्तित्वमां ज थाय
छे. जगतनो जाणनार एवो जे ज्ञानस्वरूप आत्मा, तेना अस्तित्वना
स्वीकार वगर जगतना कोई पदार्थना अस्तित्वनो निर्णय थई शके
नहीं. माटे बधा पदार्थोमां आत्मानी ऊर्ध्वता छे.
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कानजीस्वामीनां अध्यात्मभावनाभरपूर वैराग्यप्रेरक प्रवचनोनो सार.
स्वतएव तदाप्नोति यतो नावर्तते पुनः ।।९९।।
करीने सिद्ध के अर्हंत भगवंतो परमात्मदशाने नथी पाम्या, पण आत्मस्वरूपनो आश्रय करीने तेना
पोताना चैतन्यपदने छद्मस्थज्ञानी पण पोताना स्वानुभव वडे बराबर जाणी शके छे. एने जाणीने
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संस्कृतमां लखे छे के मोक्ष कई रीते पामे छे? –के
विपरीत तरफ तेनो भाव झुके नहि. पण अहीं तो एनाथी आगळ वधीने ठेठ आराधनानी
पूर्णतानी उत्कृष्ट वात छे. साचा देव–गुरुने ओळख्या पछी पण तेमना ज लक्षे रागमां रोकाई
रहेतो नथी पण एमना जेवा निजस्वरूपना अनुभवमां एकाग्र थईने मोक्षने साधे छे. जेटली
निजस्वरूपमां एकाग्रता तेटलो मोक्षमार्ग. अहो, एकला स्वाश्रयमां मोक्षमार्ग समाय छे.
अंशमात्र पराश्रय मोक्षमार्गमां नथी. मोक्षमार्गमां परनो आश्रय माने तेणे साचा मोक्षमार्गने
जाण्यो नथी. भाई, परना आश्रये मोक्षमार्ग मानीश तो तेनुं लक्ष छोडीने निजस्वरूपनुं ध्यान तुं
क्यारे करीश? पर लक्ष छोडी, निजस्वरूपना ध्यानमां लीन थया वगर त्रणकाळमां कोईनो मोक्ष
थाय नहीं. –हजी आवो मार्ग पण नक्क्ी न करे ते तेने साधे क्यारे? मार्गना निर्णयमां ज जेनी
भूल होय ते तेने साधी शके नहीं. अहीं तो निर्णय उपरांत हवे पूर्ण समाधी प्राप्त करीने जन्म–
मरणना अभावरूप सिद्धपद थवानी वात छे. –ए ज साचुं समाधिसुख छे. “सादि अनंत अनंत
समाधि सुखमां, अनंत दर्शन ज्ञान अनंत सहित जो” –आवा निजपदनी प्राप्तिनो अपूर्वअवसर
आवे–एवी आ वात छे.
समजावे छे–
अन्यथा योगतस्तस्मान्न दुःखं योगिनां क्वचित् ।।१००।।
उत्पत्ति साथे तेनी उत्पत्ति, अने देहना नाशथी तेनो नाश–एम थाय, एटले मोक्षने माटे कोई
यत्न करवानुं न रहे. देहना संयोगोथी आत्मा उपजे ने देहना वियोगथी आत्मा नाश पामे, –
देहथी जुदो कोई आत्मा छे ज नही–एम नास्तिक लोको माने छे;
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तेमां महा आनंद छे, तेमां किंचित् दुःख नथी.
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अत्यारे तो लोको बहारमां फरज–फरज करे छे,
देशनी फरज, कुटुंबनी फरज पुत्रनी फरज,
युवानोनी फरज–एम अनेक प्रकारे बहारनी
फरज मनावे छे ने मोटा मोटा भाषण करे छे,
–पण अहीं तो कहे छे के, भाई, ए बधी
बहारनी फरज ते तो वृथा व्यथा छे, –मफतनी
हेरानगती छे. आ आत्मानी समजण करवी ते
ज बधायनी खरी फरज छे, –ए फरज एक वार
बजावे तो मोक्ष मळे.
आत्मा कांई करी शकतो नथी, छतां फरज माने
ते तो मिथ्या–अभिमान छे, तारो स्व–देश तो
तारो आत्मा छे, अनंत गुणथी भरेलो तारो
असंख्यप्रदेशी आत्मा ज तारो ‘स्वदेश’ छे,
तेने ओळखीने तेनी सेवा (आराधना) कर, ते
तारी फरज छे; ए सिवाय बहारनो देश ते तो
‘पर–देश’ छे, तेमां तारी फरज नथी.
–तो कहे छे के ना; राग ते पण खरेखर फरज
नथी. राग करे छे पोते, पण ते फरज नथी–
कर्तव्य नथी, केम के तेमां पोतानुं हित नथी.
जेमां पोतानुं हित न होय तेने फरज केम
कहेवाय? अंतरमां चैतन्यमूर्ति आनंदथी
भरपूर पोताना आत्माने ओळखीने तेना
आश्रये सम्यक्श्रद्धा–ज्ञान–चारित्र प्रगट
करवा, ने ए रीते आत्माने भवदुःखथी
छोडाववो ते दरेक जीवनी फरज छे.
देहमां तारी कंई फरज नथी,
ने देह तने शरण नथी.
राग ते तारी फरज नथी,
ने राग तने शरण नथी.
ते ज तारुं स्वरूप छे,
ने ते शक्तिनी संभाळ करीने तेमांथी
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मान्यतामां जे रोकाय छे ते पोतानी वास्तविक
फरज चूकी जाय छे. माटे हे भव्य! परनुं
करवानी बुद्धि तुं छोड, ने आत्महितमां तारी
बुद्धि जोड. आत्मानी
सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्र प्रगट करीने तारा
आत्माने भवभ्रमणथी छोडाव....ने ए रीते
तारी फरज बजाव. आ मनुष्यपणुं पामीने
आत्माने हवे भवदुःखथी छोडाववो ते ज, हे
जीव! तारी फरज छे, ने ते माटे तुं तारा
आत्माने ओळखवानो प्रयत्न कर.
(आत्मप्रसिद्धि)
पोतानो आनंद पोतामां भर्यो छे पण पोताना आनंदने भूल्यो एटले
तेनो आरोप बीजामां कर्यो के ‘आमां मारो आनंद छे. ’ –पण ए
आरोप मिथ्या छे–खोटो छे.
सुख ते आत्मानो स्वभाव न रह्यो! पण भाई, एवो (सुख
वगरनो) आत्मा न होय. आत्मा तो सुखस्वरूप छे. आत्मा आनंदथी
खाली नथी, आत्मा पोताना आनंदथी भरेलो छे. एनुं भान करतां
आनंदना स्वादनुं वेदन थाय छे.
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सविकल्पदशा वखते तेनुं ज्ञान विकल्पथी जुदुं नथी’ –एम नथी. अनुभवपूर्वक रागथी भिन्न
ज्ञान परिणम्युं ते पछी साधकदशामां सदाय (निर्विकल्प के