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शुद्धआत्माना आनंद सामे जोजे. शूरवीर थईने–उद्यमी थईने
प्रतिकूळतामां के पुण्यनी मीठासमां कयांय अटकता नथी; एने
बंधनथी सर्वथा प्रकारे जुदो अनुभवे छे. आवो अनुभव
अंतरमां एकाग्र करीने त्रिकाळी चैतन्यप्रवाहरूप आत्मामां मग्न
जाण. आम सर्व प्रकारे भेदज्ञान करीने तारा एकरूप
पामीने हे जीव! भेदज्ञान वडे शुद्धआत्माने अनुभवमां लईने तुं
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पचीस वर्ष पूरा थाय छे. त्यारे गुरुदेवना
परम उपकारथी भरेला संस्मरणो घणी
भकितथी जागृत थाय छे...ने पवित्र संतोना
चरणोमां वीतेला मधुरताभर्या पचीस वर्ष
हृदयने पुलकित करे छे.
आ अबुध बाळकने ते वखते तो कल्पना पण न हती के हवेनुं आखुंय जीवन आ
संतना चरणमां ज रहेवानुं महाभाग्य मळशे. ते वखते तो मारा वडील भाईजीनी साथे
मात्र चार दिवस माटे राजकोट आवेलो, अने मारा भाईजीनी प्रेरणाथी एक
डायरीबुकमां में गुरुदेवना प्रवचनमांथी थोडीक नोंध करी. ते वखते प्रवचनमां
समयसारनी छठ्ठी गाथानो छठ्ठो दिवस चालतो हतो...ने में पहेलुं वाकय आ लख्युं हतुं
: ‘द्रव्यद्रष्टिथी द्रव्य जे छे ते ज छे.’
थवा द्ये! अजाण्यो अजाण्यो रस्तो शोधतो हुं स्टेशन तरफ जई रह्यो हतो त्यां तो
अचानक वरसाद आववा लाग्यो –जाणे के ए वरसादरूपी मधुरी वाणीद्वारा आकाश
मने कहेतुं होय के ‘तुं अहींथी जा मा...अहीं ज तारुं हित छे.’ छतां हुं ते आकाशवाणी
न समज्यो ने स्टेशन तरफ आगळ पहोंच्यो. स्टेशननी नजीक पहोंचता ज जोयुं के
ट्रेईन तो आ चाली जाय!!
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आ वात लक्षमां तो ले. मांड आवा टाणां मळ्या
छे...तेमां करवानुं तो एक आ ज छे. अंदरमां जरा
धीरो थई, बहारना कार्योनो रस छोडी, विचार कर तो
तने जणाशे के आत्मानो स्वभाव अने राग बंने एक
थईने रहेवा योग्य नथी पण जुदा पडवा योग्य छे.
बंनेनो स्वभाव जुदो छे तेथी जुदा पडी जाय छे.
भाई! समय–समय करतां काळ तो चाल्यो ज जाय छे;
तेमां जो तुं तारा स्वभाव–सन्मुख न थयो तो तें शुं
कर्युं? जे करवा जेवुं कार्य छे ते तो आ ज छे. गमे
तेटला प्रयत्नवडे पण विकारथी भिन्न चेतननो
अनुभव करवो–ते ज करवानुं छे.
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पराश्रित एवा समस्त व्यवहारने छोडीने अने स्वाश्रित एवा सम्यक्
निश्चयरूप शुद्ध आत्मामां एकमां ज निष्कंप रहीने वीतरागमार्गी
संतोए मोक्षमार्ग साध्यो छे, अमे पण ए ज विधिथी मोक्षमार्ग साधी
रह्या छीए...ने जगत पण ए ज एक विधिथी मोक्षमार्गने साधो.
बधा अंदरमां कई रीते मोक्षमार्गने साधे छे ते अहीं बताव्युं छे. आमां जैनशासननो
नीचोड आवी जाय छे.
एकाग्रता वडे ज सुख छे; कोईपण पराश्रयभावमां सुख नथी. पराश्रितभाव ते तो
दुःख छे; माटे बधोय पराश्रयभाव छोडवानो भगवाननो उपदेश छे, ने एकला शुद्ध–
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आश्रयथी लाभ माने, तो तेणे भगवानना स्वालंबी उपदेशने जाण्यो नथी.
भगवाननो उपदेश तो स्वालंबननो एटले के शुद्धात्माना आश्रयनो छे; एम करे तेणे
ज भगवानना उपदेशने यथार्थ झील्यो कहेवाय.
करीने आनंदने अनुभवे छे. –एटले सम्यग्द्रष्टि थवानी पण आ ज रीते छे के
व्यवहारनो आश्रय छोडीने शुद्धआत्मानो आश्रय करवो, –ए पण आमां आवी गयुं.
भाई! तारे जन्म–मरणनां दुःखोनो अंत लाववो होय ने परम सुखनो अनुभव करवो
होय तो परथी अत्यंत भिन्न आत्माने जाणीने तेमां ज स्थिरता कर.
छोडीने, पोताना शुद्धस्वरूपमां ज एकाग्र थईने तेना अनुभवथी सम्यग्दर्शन–ज्ञान–
चारित्र प्रगट करे छे. आ रीते शुद्धात्माना आश्रये मोक्षमार्ग छे माटे तेनो आश्रय
करवा जेवो छे; ने जेटला पराश्रित व्यवहारभावो छे ते बधा मोक्षमार्ग नथी पण
बंधमार्ग छे माटे ते बधानो आश्रय छोडवा जेवो छे. अहो, आवो स्पष्ट मार्ग
भगवाने दिव्यध्वनि द्वारा समवसरणमां बताव्यो ने गणधर वगेरे सन्तोए ते झील्यो,
ने जगतना जीवोने उपदेश्यो. आवा मार्गनो निश्चय तो करो!
रागना आश्रये के शरीरना आश्रये मोक्षमार्ग कह्यो नथी. मोक्ष कोण पामे? के जे
निश्चयरूप शुद्धात्मानो आश्रय करे ते; ‘‘निश्चयनयाश्रित मुनिवरो प्राप्ति करे
निर्वाणनी.’’
छे, जोरथी पोताना स्वभावनुं अवलंबन करे छे...शुद्ध ज्ञानघन स्वभावना महिमामां
पोताना आत्माने एकाग्र करे छे...निष्कंपपणे आक्रमीने शुद्धस्वरूपमां पहोंची जाय छे.
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अनुभवमां ल्ये छे. सम्यक् निश्चयने एकने ज अनुभवीने शुद्धज्ञानघनना महिमामां
ज्ञान स्थिर थयुं–ते ज शरण छे, ते ज शांति छे, ते ज मोक्षमार्ग साधवानी रीत छे.
करवाथी मोक्षमार्ग सधाय छे. आ सिवाय बीजाना आश्रये मोक्षमार्ग माने तो तेने
मार्गनी विपरीतता छे, एटले के मिथ्यात्व छे. मोक्षमार्गना जे रत्नत्रय छे ते अन्य
द्रव्योथी अत्यंत निरपेक्ष छे ने एक पोताना शुद्धस्वरूपनुं ज तेने अवलंबन छे
माने ते तेमां एकताबुद्धि कर्या विना रहे नहि. अहीं समजावे छे के हे भाई! मोक्षनो
मार्ग तो एक शुद्ध आत्मवस्तुना ज आश्रये छे, अन्य कोईना आश्रये मोक्षमार्ग नथी.
माटे बधाय परनो आश्रय छोडीने सन्तो मात्र एक निर्विकल्प चैतन्य वस्तुने ज
अनुभवे छे. तेनो ज आश्रय करे छे. जेमां रागादि समस्त पराश्रयभावोनो अभाव छे
एवी निर्विकल्प वस्तु, तेना अनुभव वडे सम्यकत्वादि थाय छे ने मिथ्यात्व छूटे छे.
मदद–अपेक्षा नथी. विकल्पनीये अपेक्षा नथी. आवो परम निरपेक्ष मोक्षमार्ग छे.
बंधनुं ज कारण होवाथी भगवाने ते पराश्रयभावो छोडाव्या छे; पराश्रित एवो
बधोय व्यवहार भगवाने छोडाव्यो छे, एटले के तेनो आश्रय छोडीने सम्यक्
निश्चयरूप एक शुद्धआत्मानो ज निष्कंप आश्रय कराव्यो छे; तेना ज आश्रये
मोक्षमार्ग छे. जेटलो शुद्धात्मानो आश्रय छे तेटलो ज मोक्षमार्ग छे; जेटलो
पराश्रयभाव छे तेटलो बंधभाव छे. ज्ञानीने ते पराश्रयभावमां एकत्वबुद्धि छूटी गई
छे तेथी तेनाथी ते छूटो छे–मुक्त छे.
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आश्रय करीने अशुद्धतानो अनुभव करे तेने जैनशासन नथी कह्युं, तेने धर्म नथी कह्यो.
शुद्धवस्तुना अनुभव वगर धर्म केवो? हजी तो शुभराग ते जैनधर्म छे एम माने ते
लाभबुद्धि, ते तो मिथ्याबुद्धि छे. मोक्षमार्ग तो भगवाने शुद्धात्माना सेवनथी ज कह्यो छे.
विकल्परूप व्यवहारनो आश्रय छोड, ने शुद्धआत्मानो आश्रय कर त्यारे ज तने
अंतरमां आनंदनो अनुभव थशे ने त्यारे ज मोक्षमार्ग शरू थशे. आ कळशना रचनार
अमृतचंद्राचार्यदेवे ज पुरुषार्थसिद्धिउपाय शास्त्र रच्युं छे; तेमां पण कहे छे के–
भवबीजम् ।’
रागरूप ने शरीररूप होय एवो प्रतिभास थाय छे; अज्ञानीओनो ते प्रतिभास खरेखर
भवनुं बीज छे.
शुद्धआत्माने अनुभवमां लेवो ते मोक्षनुं बीज छे. तेमां क्यांय रागनी अपेक्षा नथी,
रागथी तो ते असंयुक्त छे. शुद्धआत्मानो अनुभव रागने स्पर्शतो नथी.
लाभबुद्धि रहेती नथी. विकल्पनी परवा वगरनो खुद आत्मा पोते पोताने
स्वानुभूतिथी अनुभवे छे, –आवो मोक्षमार्ग भगवाने कह्यो छे. राग–विकल्प के भेदरूप
व्यवहारनो जेटलो आश्रय छे तेटलो तो अशुद्ध भावबंध छे, ते मोक्षनुं कारण थई
शकतो नथी.
सन्तो एटले सम्यग्द्रष्टि साधकजीवो विकल्पथी भिन्न थईने, व्यवहारनो आश्रय
छोडीने, एक
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मोक्षमार्गने साधवानी रीत छे.
एकताबुद्धि सम्यग्द्रष्टिने रहेती नथी. माटे ‘सम्यग्द्रष्टिने व्यवहार नथी’ –एम कह्युं; ते
एक सम्यक् निश्चयरूप शुद्धस्वरूपमां ज तन्मय–लीन छे. आवी अंतरंगद्रष्टि धर्मात्माने
होय छे. धर्मात्मानी आवी अंतरदशाने व्यवहारनी रुचिवाळो ओळखी शके नहि. आ
तो वीतरागी शास्त्रोनो अपूर्व नीचोड छे. शुद्धस्वरूपनो अनुभव करवो ने व्यवहारनो
आश्रय छोडवो ते सर्वे वीतरागीशास्त्रोनुं तात्पर्य छे एटले ते जैनशासननो सार छे ने
ते मोक्षमार्ग छे. आ रीते ज मोक्षमार्ग सधाय छे.
जुओ, वीतरागमार्गी सन्तोए मोक्षमार्ग कई रीते साध्यो तेनी आ वात छे.
परमारथनो पंथ.’ सम्यक् निश्चयरूप जे पोतानो शुद्धस्वभाव, तेनुं अवलंबन करतां
बीजा बधानुं (भेदनुं–रागनुं–परनुं) अवलंबन छूटी जाय छे. पराश्रयभावमां रागनी
उत्पत्ति छे, तेथी जेटला पराश्रितभावो छे तेमनो मोक्षमार्गमां निषेध छे. शुभराग–
विकल्प होय पण धर्मी तेने मोक्षमार्गरूप नथी जाणता. तेने बंधभाव तरीके जाणीने हेय
समजे छे. जगतमां जे कोई सम्यग्द्रष्टि–जीवराशि छे ते आ प्रकारे ज मोक्षने साधे छे.
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निजानंदनी मस्तीमां विचरे छे.
ज्ञानानंदस्वरूपना अवलंबने ज अनंतकाळनुं महान सुख प्रगटे छे. माटे सन्तो,
सम्यग्द्रष्टि धर्मात्माओ; अतीन्द्रिय सुखना अभिलाषीओ, परम संतोषथी
निजमहिमाथी भरपूर शुद्धस्वरूपमां ज एकाग्रता करे छे. सम्यक्निश्चयरूप निजस्वरूप
सिवाय बीजानो महिमा धर्मीने आवतो नथी. भाई! तेरा पंथ बहारमें नहि, तेरा पंथ
रागमें नहि, तेरा पंथ तारा शुद्धस्वरूपमां ज छे. आवा शुद्धस्वरूपने जेओ अवलंबे छे
तेओ ज भगवानना पंथमां छे. रागथी धर्म माने तेओ भगवानना पंथमां नथी.
अवलंबन सर्वथा छोडीने शुद्धस्वरूपना निज महिमामां ज ज्ञानने एकाग्र करे छे.
आक्रमे छे एटले के पुरुषार्थ वडे तेमां पहोंची वळे छे, –अंतर्मुख थईने तेमां प्रवेशे छे.
बीजा बधाने छोडे छे ने अंतरमां सम्यक्निश्चयने एकने ज ग्रहण करे छे, –आ ज
मोक्षमार्ग छे, ने आज धर्मात्मानुं चिह्न छे.
पंथना केडायती एवा सन्तो आ प्रकारे एक निश्चयना आश्रये मोक्षमार्गने साधे छे.
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तो तारो अनंतकाळ संसारमां वीत्यो. रागादिभावोने पोताना मानीने अनंतकाळ तें
दुःखमां ज गुमाव्यो. एनाथी छूटवा ने अनंतकाळनुं सुख पामवा माटे मोक्षनो आ महा
पंथ वीतरागी सन्तोए बताव्यो छे तेनुं सेवन कर. स्वभावना सेवनथी जे शुद्धभावो
प्रगट्या तेमां व्यवहारना बंधभाव जरापण छे ज नहि, ते अबंधभाव छे, अबंधभाव
कहो के मोक्षमार्ग कहो.
छे. ने व्यवहारना आश्रये कदी मोक्ष साधी शकातो नथी. माटे सम्यग्द्रष्टिने सघळाय
व्यवहारनो आश्रय छूटी गयो छे; एने जे शुद्धभाव प्रगट्यो छे तेमां निश्चयनो ज
एकनो आश्रय छे, व्यवहारनो आश्रय तेमांथी छूटी गयो छे...आवी परिणति वडे ज
मोक्षमार्ग सधाय छे. –मोक्षमार्ग साधवानी आ रीत छे.
ज्ञानधारानुं फळ सादिअनंत परम आनंदनी प्राप्ति छे; कर्मधारा ते दुःखरूप छे. आम
बंने धारानी अत्यंत भिन्नतानुं स्वरूप पोताना भावमां स्पष्ट भासवुं जोईए. बंनेने
एकबीजानां भेळवी द्ये, बंधभावना एक अंशनेय मोक्षमार्ग माने–तो तेने मोक्षना
कारणने जाण्युं ज नथी, मोक्षमार्ग तेणे जोयो ज नथी, एटले ते तो बंधनमां ज वर्ते छे.
अहीं ते बंधनथी छूटवानी ने मोक्षमार्ग साधवानी रीत वीतरागी सन्तोए बतावी छे.
देहनो तो संयोग क्षणमां छूटी जशे, –भाई! आवा जीवनमां मोक्षमार्गने
साध...आत्माना स्वरूपनो निर्णय कर...ने अरिहंतदेवना वीतराग मार्गमां आव.
शुद्धआत्माना आश्रय वगर वीतरागमार्गमां अवातुं नथी. वीतरागमार्गमां सन्तोनी
शैली कोई अजब छे! एमना अंदरना भावो अपूर्व गंभीर छे. समयसार कोई अपूर्व
मांगळिक पळोमां जगतना महाभाग्ये रचाई गयुं छे...कुंदकुंदाचार्यदेव स्वानुभवमां
झूलता झूलता अंदर कलम बोळी बोळीने पोन्नूर पर्वत उपर ज्यारे आ समयसार
लखता हशे (ते वखतनी भावभीनी अद्भुत चेष्टा बतावीने गुरुदेव कहे छे के–)
अहो! वीतरागी सन्तोए न्याल कर्या छे!
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मोक्षमार्ग जाणीने अंदरमां तेनो उद्यम करवा जेवुं छे. आवो मोक्षमार्ग सांभळवा मळवो
ते पण महा भाग्ये मळे छे, ने अंदर तेनो निश्चय करे ते तो न्याल थई जाय एवुं छे.
व्यवहारनो आश्रय छूटी ज गयो छे. स्वाश्रयभाव ने पराश्रयभाव बंनेने एकता कदी
थती नथी, बंने भिन्न ज छे. आवी भिन्नतानुं भान थवुं तेमां मोक्षमार्गनी शरूआत
छे. वारंवार भावना घूंटीने आ भावो अंतरमां द्रढ करवा जेवा छे, आत्मामां एना
संस्कार पडतां अपूर्व कल्याण थाय छे. ने मोक्षमार्ग सधाय छे.
कर्तव्य छे.
पूरा थशे. (वच्चे एक तिथि घटती होवाथी दसलक्षणीपर्वनो प्रारंभ एक दिवस वहेलो
थाय छे.)
थशे अने श्रावण वद ९ रविवार ता.१८–८–६८ सुधी चालशे. उत्तम श्रेणीमां जैन
सिद्धान्त प्रश्नोत्तरमाळा अने जैन तत्त्वमीमांसा चालशे, तो ते पुस्तको जेमनी पासे होय
तेमणे साथे लाववा. (आ शिक्षणवर्ग मात्र मोटी उंमरना भाईओ माटे छे. अने
वर्गमां मात्र भाईओ ज बेसे छे, बहेनो माटे आ वर्ग नथी.)
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जे भाव आत्माना स्वरूपपणे न अनुभवाय ते हेय छे.
जे रागादिक परभावो छे तेओ आत्माना चेतनस्वभाव साथे मेळवाळा नथी
अनुभवाता नथी, माटे तेओ जीवनुं स्वरूप नथी.
सिद्धान्तमां आत्मानो आवो अनुभव करवानुं कह्युं छे माटे मोक्षार्थीए आवो अनुभव
करवो. –एनुं ज नाम सिद्धान्तनुं सेवन छे.
अभिलाषी जीवो आवा आत्मानुं सेवन करो. परम ज्ञानप्रकाशी आत्मा
स्वसंवेदनप्रत्यक्ष छे. ज्ञाननुं लक्षण शुं ने रागनुं लक्षण शुं–एम बंनेना भिन्न लक्षणने
मोक्षनो मार्ग छे.
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आकुळतानुं झेर नथी.
भावो रुचिकर न लागे; तेने ते उपादेय न समजे. वीतरागी मोक्षसुखनो अभिलाषी
रागने केम सेवे? ते तो परभावोथी रहित एवा पोताना शुद्धस्वरूपने ज सेवे छे. –
आवुं सेवन ते ज सिद्धान्तनुं साचुं सेवन छे.
सिद्धान्तनुं सेवन नथी, तेमां तो सिद्धान्तनो अनादर छे.
वेदन छे.
अज्ञानथी निरंतर रागने अनुभव्यो, तेम हवे ‘रागादि ते हुं नथी, शुद्ध चैतन्यभाव ज
हुं छुं’ एम निरंतर शुद्धात्मानुं सेवन करो, तेने ज पोतापणे अनुभवमां ल्यो. –आवो
अनुभव ते ज मोक्षनुं कारण छे, ते ज मोक्षार्थी जीवे करवानुं कार्य छे. ए सिवाय पुण्य
के पुण्यफळरूप भोगो, संसार के शरीर–तेनी अभिलाषा मोक्षार्थी धर्मात्माने नथी.
स्वसंवेदन प्रत्यक्ष एवुं जीवद्रव्य हुं छुं, शुद्धज्ञानप्रकाशमय हुं छुं, अतीन्द्रियसुख ते हुं छुं–
अणमळता छे. शुद्धस्वरूपने रागादि साथे मेळ नथी–मिलन नथी–एकता नथी,–पण
भिन्नता छे. जेटला रागादिभावो छे ते बधाय शुद्धचैतन्यना अनुभवथी पर छे; ते
पोताना स्वरूपपणे नथी अनुभवाता. माटे हे मोक्षार्थी जीवो! तमे आवा शुद्धस्वरूपना
अनुभवरूप सिद्धान्तनुं सेवन करो.
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शुं ने बंध शुं–ए बंनेना भिन्नलक्षणने ओळखीने जे चेतना आत्मस्वभाव तरफ झूकी
ते भगवती चेतना ज बंधनथी छूटवानुं (एटले के मोक्षनुं) साधन छे. रागादि
बंधभावो तो आत्मस्वभावथी जुदा छे; ते कोई पण रागभाव आत्माने मोक्षनुं कारण
थतुं नथी. ते रागभावोने तो आत्माथी भिन्न करवाना छे. रागथी जुदी एवी जे
चेतना (–के जे आत्मानुं स्वलक्षण छे) तेना वडे ज बंधनथी भिन्न आत्मा
अनुभवमां आवे छे; आ रीते चेतनारूप भगवती प्रज्ञा ज मोक्षनुं कारण छे. जीवनुं
पोताना शुद्धस्वरूपे परिणमवुं, ने एवुं परिणमन थतां कर्मनो संबंध छूटी जवो तेनुं
नाम मोक्ष छे. मोह–राग–द्वेषादि अशुद्ध परिणतिरूपे परिणमन थवुं ने कर्मनो संबंध
अनुभव थाय ते ज्ञान मोक्षनुं साधन छे. आवो अनुभव थतां शुद्धपरिणमन थयुं
एटले अशुद्धपरिणमन छूटी गयुं ने पुद्गलमां कर्म अवस्था छूटी गई. –शुद्धजीव
पोताना स्वरूपमां रह्यो–ते दशानुं नाम मोक्ष छे. –‘मोक्ष कह्यो निज शुद्धता.’
सरस खुलासो आ ‘प्रज्ञाछीणी’ ना श्लोकमां कर्यो छे.
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अनुभव ते ज मोक्षनुं साधन छे. ज्ञाननी साथे जे रागने भेळवे–तेने शुद्धतानो
अनुभव थतो नथी, भेदज्ञान थतुं नथी, मोक्षमार्ग थतो नथी. शुद्धपरिणमन ते रागथी
रहीने शुद्धने अनुभवी शकाय नहि.
अनंतचतुष्टयरूप छे; ते रागथी सर्वथा जुदुं छे. द्रव्यना स्वभावनी जातनुं परिणमन होय
तेने ज द्रव्यनुं शुद्धपरिणमन कह्युं; रागादि अशुद्धताने द्रव्यनुं शुद्धपरिणमन कहेता नथी. आ
रीते ज्ञानपरिणमन अने रागपरिणमननी सर्वथा भिन्नता छे. रागनो एक्क्ेय अंशज्ञानना
परिणमनमां नथी; ने ज्ञाननो एक्केय अंश रागमां नथी. राग ते शुद्धआत्मानुं परिणमन
ज नथी तो पछी ते आत्मानी शुद्धतानुं साधन केम थाय ? –न ज थाय.
जाण्या वगर जीवे अज्ञानभावथी शुभरागने मोक्षनुं साधन मानीने अनादिकाळथी ते
बंधभावनुं ज सेवन कर्युं छे, एटले मिथ्यात्वने ज सेव्युं छे. रागथी पार एवी
निर्विकल्प अनुभूति मोक्षसाधन छे. ते निर्विकल्प अनुभूति वचनमां आवती नथी, ते
वीतरागपरिणतिनी शी वात? अंतर्मुख थयेलुं स्वसंवेदन ज्ञान आत्माने शुद्धतारूप
परिणमावे छे, ने ते ज मोक्षनुं कारण छे. एकलुं बहारनुं जाणपणुं पण मोक्षनुं कारण
नथी त्यां रागनी तो शी वात? ज्ञान केवुं, –के वीतराग परिणतिरूपे परिणमेलुं
स्वसंवेदनज्ञान ते मोक्षनुं कारण छे.
शुद्धपरिणमन तेने ज होय छे के जेने शुद्धस्वरूपनो अनुभव जरूर होय.
चोथुंगुणस्थान पण न थाय. चोथा गुणस्थानथी ज शुद्धस्वरूपनो अनुभव छे,
शुद्धपरिणमन छे, मोक्षमार्ग छे; तेने अंतरात्मा कह्या छे. चोथा गुणस्थाने शुद्धस्वरूपनो
अनुभव होवानी जे ना पाडे तेने अनुभवदशानी के चोथागुणस्थाननी खबर नथी,
तेने मोक्षमार्गनी खबर नथी.
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आवुं परिणमन थयुं त्यारे ज मोक्षमार्ग शरू थयो.
एकमेक नथी, पण बंने वच्चे संधि छे–सांधो छे, लक्षणभेद छे. एकक्षेत्रे होवा छतां बंने
एकस्वभावे नथी, बंनेना स्वभाव वच्चे मोटो आंतरो छे. ते आंतरो लक्षमां लईने
थाय छे. –आनुं नाम भेदज्ञान, ने आ मोक्षमार्ग.
ज्ञानने एकाग्र करतां बंधभावो छूटी जाय छे. तेने माटे उपयोगमां सावधानी जोईए.
बतावे ने अंदरमां रागथी जुदा शुद्धात्मानो अनुभव करतां जो न आवडे तो तेने निपुण
कहेता नथी, ते ठोठ छे, आत्माने बंधनथी छोडाववानी विद्या तेने आवडती नथी.
ज्ञानछीणी वडे तेमने जुदा पाडी शकाय छे. आत्मा अने बंध बंने एवा एकमेक नथी
थई गया के वच्चे ज्ञानछीणी न पेसी थशे; बंने वच्चेनो भेद ज्ञानवडे जाणी शकाय छे;
भेदज्ञानवडे बंनेने भेदी शकाय छे.
दुःखरूप छे, ने ज्ञाननो स्वाद तो शांत–सुखरूप छे, एम विवेकद्वारा बंनेना स्वादनी
शुद्धस्वरूपमां पेसीने तेने अनुभवमां ल्ये छे, ने रागादिने जुदा करी नांखे छे.
सूक्ष्मसांधने भेदीने एककोर ज्ञानस्वरूप आत्मा, ने बीजीकोर अज्ञानरूप एवा बंधभावो,
तेमने सर्वथा जुदा करी नांखे छे. बंधभावना कोई अंशने ज्ञानमां रहेवा देती नथी,
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मोक्षनुं साधन छे.
विभाव वच्चेनो भेद जाणीने तेमनी भिन्नतानो अनुभव करे छे; केमके बंने वच्चे
लक्षणभेदनी तीराड छे. स्थूळज्ञानथी अज्ञानीने ते तीराड नथी देखाती पण ज्ञाननी
अंतर एकाग्रतावडे ते बंने वच्चेनी सांध जाणीने, ज्ञान पोताना स्वभावमां एकाग्र
थाय छे. एकाग्र थतां ज बंने स्पष्ट भिन्न जुदा अनुभवमां आवे छे; ज्ञाननो अनुभव
थयो ते अनुभवमां रागनी सर्वथा नास्ति छे. प्रथम आवी भिन्नता अनुभवतां
सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान थाय छे; पछी सकळ रागादिनो तथा कर्मनो क्षय थवाथी
बंधने सर्वथा छेदीने साक्षात् मोक्षदशा प्रगट थाय छे. आ रीते प्रज्ञा छीणीवडे बंधनने
छेदीने आत्मा मुक्त थाय छे. माटे प्रज्ञारूप ज्ञानचेतना ते मोक्षनो पंथ छे.
अनुभवाय छे. आमां अंर्तमुख उपयोगनो घणो प्रयत्न छे. देह–मन–वाणी तथा
जडकर्म–ते तो जीवथी एकक्षेत्रे होवा छतां भिन्न प्रदेशवाळा छे, रूपी छे, जड छे, ते
नवा आवे छे ने जाय छे–एटले ते तो जीवथी भिन्न छे–एवी प्रतीति विचार वडे
ऊपजे छे. पण अंदरमां जीवनी पर्याय साथे एक प्रदेशे रहेला जे रागादिभावो,
तेमनाथी भिन्न शुद्धजीवनो अनुभव कठण छे, –कठण होवा छतां सूक्ष्म प्रज्ञा वडे तेमनी
वच्चेना स्वभाव भेदने जाणीने भिन्नतानो अनुभव थई शके छे. कठण छे–पण
अशकय नथी, थई शके तेवुं छे. ने आवी भिन्नतानो अनुभव करावनारी भगवती
जतो नथी, रागना अभावे पण आत्मा पोताना चेतनस्वरूपे जीवे छे. माटे
चेतनास्वरूप ज जीव छे, रागस्वरूप नथी.–आवुं अंदरनुं भेदज्ञान अत्यंत कठण होवा
छतां अंदरना तीव्र प्रयत्नवडे थई शके छे. रागना काळे ज तेनाथी भिन्न शुद्धजीवनो
अनुभव ज्ञानचेतना वडे जरूर थाय छे. ज्ञानचेतना अति सूक्ष्म छे, चक्रवर्तीनी
तलवारनी तीखी धारनी जेम एक झाटके ते प्रज्ञाछीणी ज्ञान अने रागना बे कटका करी
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भेदज्ञान निपुण पुरुषो करे छे; निपुण पुरुषो एटले आत्मानुभवमां प्रवीण जीवो; –
संसारनो किनारो नजीक आवी गयो छे. आवा भेदज्ञाननिपुण जीवो प्रज्ञाछीणी वडे
शुद्धस्वरूपथी बहार जुदा रही जाय छे. आ मोक्षमार्ग छे.
विचार करे तो तने जणाशे के आत्मानो स्वभाव अने राग बंने एक थईने रहेवा
सन्मुख न थयो तो तेें शुं कर्युं ? जे करवा जेवुं कार्य छे ते तो आ ज छे. गमे तेटला
चेतनाने रागथी जुदी करीने शुद्ध स्वरूपमां पेसाड...ते क्षणे ज तने परम आनंद थशे.
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मारे मारो आत्मा प्राप्त करवो छे, मारे मारा आत्माने भवबंधनथी छोडाववो छे–एम
अत्यंत सावधान थईने, महान उद्यमपूर्वक हे जीव! तुं तारा आत्माने बंधनथी जुदो
अनुभवमां ले....अनादिनी ऊंघ ऊडाडीने जागृत था.
शूरवीर थईने– उद्यमी थईने आनंदनो अनुभव करजे. ‘हरिनो मारग छे शूरानो’...ते
प्रतिकूळतामां के पुण्यनी मीठासमां कयांय अटकता नथी; एने एक पोताना आत्मार्थनुं
ज काम छे. ते भेदज्ञानवडे आत्माने बंधनथी सर्वथा प्रकारे जुदो अनुभवे छे. आवो
अनुभव करवानो आ अवसर छे –भाई! तेमां शांतिथी तारी चेतनाने अंतरमां
एकाग्र करीने त्रिकाळी चैतन्यप्रवाहरूप आत्मामां मग्न कर....ने रागादि समस्त
बंधभावोने चेतनथी जुदा अज्ञानरूप जाण. आम सर्वथा प्रकारे भेदज्ञान करीने तारा
एकरूप शुद्धआत्माने साध. मोक्षने साधवानो आ अवसर छे.
शुद्धआत्माने अनुभवमां लईने तुं मोक्षपंथे आव.
वांचुं सदा सद्ग्रंथ....स्वानुभूति कां थाय नहि?
स्व–पर भिन्न कहुं छतां उपयोग स्वमां आवे नहि,
जीवन पळो खूटी रही, क्यम काम पूरुं थाय नहि?