Atmadharma magazine - Ank 297
(Year 25 - Vir Nirvana Samvat 2494, A.D. 1968)
(Devanagari transliteration). Entry point of HTML version.

Next Page >


Combined PDF/HTML Page 1 of 3

PDF/HTML Page 1 of 45
single page version

background image
आत्मधर्म
वर्ष २५
सळंग अंक २९७
Version History
Version
Number Date Changes
001 June 2005 First electronic version.

PDF/HTML Page 2 of 45
single page version

background image
रजतजयंतिनुं वर्ष
२९७
तुं मोक्षपंथे आव
श्रीगुरु शिखामण आपे छे के हे भव्य! आत्माना
अनुभव माटे सावधान थाजे....शूरवीर थाजे....जगतनी
प्रतिकूळता देखीने कायर थईश नहि....प्रतिकूळता सामे न जोईश,
शुद्धआत्माना आनंद सामे जोजे. शूरवीर थईने–उद्यमी थईने
आनंदनो अनुभव करजे. ‘हरिनो मारग छे शूरानो....’ ते
प्रतिकूळतामां के पुण्यनी मीठासमां कयांय अटकता नथी; एने
एक पोताना आत्मार्थनुं ज काम छे. ते भेदज्ञानवडे आत्माने
बंधनथी सर्वथा प्रकारे जुदो अनुभवे छे. आवो अनुभव
करवानो आ अवसर छे–भाई! तेमां शांतिथी तारी चेतनाने
अंतरमां एकाग्र करीने त्रिकाळी चैतन्यप्रवाहरूप आत्मामां मग्न
कर...ने रागादि समस्त बंधभावोने चेतनथी जुदा अज्ञानरूप
जाण. आम सर्व प्रकारे भेदज्ञान करीने तारा एकरूप
शुद्धआत्माने साध. मोक्षने साधवानो आ अवसर छे.
अहो, वीतरागना मारगडा...जगतथी जुदा छे. जगतना
भाग्य छे के संतोए आवो मारग प्रसिद्ध कर्यो छे. आवो मारग
पामीने हे जीव! भेदज्ञान वडे शुद्धआत्माने अनुभवमां लईने तुं
मोक्षपंथे आव.
तंत्री : जगजीवन बावचंद दोशी – संपादक : ब्र. हरिलाल जैन
वीर सं. २४९४ अषाड (लवाजम : चार रूपिया) वर्ष २प : अंक ९

PDF/HTML Page 3 of 45
single page version

background image
गुरुदेवना चरणोमां
मारा जीवना पचीस वर्ष
आ अषाड सुद बीजे ज्यारे पू.
गुरुदेवनी पवित्र छायामां आव्याने मने
पचीस वर्ष पूरा थाय छे. त्यारे गुरुदेवना
परम उपकारथी भरेला संस्मरणो घणी
भकितथी जागृत थाय छे...ने पवित्र संतोना
चरणोमां वीतेला मधुरताभर्या पचीस वर्ष
हृदयने पुलकित करे छे.
परमपूज्य कहानगुरुदेवना पवित्र चरणकमळमां हुं सं. १९९९ ना अषाड सुद
बीजना दिवसे आव्यो; अव्यक्तपणे पण ते मारा जीवननो अपूर्व मंगल दिवस हतो.
आ अबुध बाळकने ते वखते तो कल्पना पण न हती के हवेनुं आखुंय जीवन आ
संतना चरणमां ज रहेवानुं महाभाग्य मळशे. ते वखते तो मारा वडील भाईजीनी साथे
मात्र चार दिवस माटे राजकोट आवेलो, अने मारा भाईजीनी प्रेरणाथी एक
डायरीबुकमां में गुरुदेवना प्रवचनमांथी थोडीक नोंध करी. ते वखते प्रवचनमां
समयसारनी छठ्ठी गाथानो छठ्ठो दिवस चालतो हतो...ने में पहेलुं वाकय आ लख्युं हतुं
: ‘द्रव्यद्रष्टिथी द्रव्य जे छे ते ज छे.’
त्यारबाद चार दिवस पूरा थया ने हुं तो राजकोटथी पाछो मोरबी जवा माटे
रवाना थयो. परंतु, जेनुं हित थवानुं होय तेने आवा संतना चरणथी कुदरत केम दूर
थवा द्ये! अजाण्यो अजाण्यो रस्तो शोधतो हुं स्टेशन तरफ जई रह्यो हतो त्यां तो
अचानक वरसाद आववा लाग्यो –जाणे के ए वरसादरूपी मधुरी वाणीद्वारा आकाश
मने कहेतुं होय के ‘तुं अहींथी जा मा...अहीं ज तारुं हित छे.’ छतां हुं ते आकाशवाणी
न समज्यो ने स्टेशन तरफ आगळ पहोंच्यो. स्टेशननी नजीक पहोंचता ज जोयुं के
ट्रेईन तो आ चाली जाय!!
(–अनुसंधान पानुं ३९)

PDF/HTML Page 4 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : १ :
वार्षिक लवाजम वीर सं. २४९४
चार रूपिया अषाड
* वर्ष २प : अंक ९ *
अवसर आव्यो आत्मज्ञानो
गुरुदेव परम वात्सल्यभरी प्रेरणाथी कहे छे के हे
भाई! अत्यारे आत्मज्ञान माटेनो आ अवसर छे...तुं
आ वात लक्षमां तो ले. मांड आवा टाणां मळ्‌या
छे...तेमां करवानुं तो एक आ ज छे. अंदरमां जरा
धीरो थई, बहारना कार्योनो रस छोडी, विचार कर तो
तने जणाशे के आत्मानो स्वभाव अने राग बंने एक
थईने रहेवा योग्य नथी पण जुदा पडवा योग्य छे.
बंनेनो स्वभाव जुदो छे तेथी जुदा पडी जाय छे.
भाई! समय–समय करतां काळ तो चाल्यो ज जाय छे;
तेमां जो तुं तारा स्वभाव–सन्मुख न थयो तो तें शुं
कर्युं? जे करवा जेवुं कार्य छे ते तो आ ज छे. गमे
तेटला प्रयत्नवडे पण विकारथी भिन्न चेतननो
अनुभव करवो–ते ज करवानुं छे.
(प्रज्ञाछीणीना प्रवचनमांथी : पूरुं प्रवचन अंदर वांचो)

PDF/HTML Page 5 of 45
single page version

background image
: २ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
मोक्षमार्ग साधवानी रीत
भगवाने पराश्रयरूप व्यवहार बधोय छोडाव्यो छे
शुद्ध वस्तुरूप निश्चयनुं एकनुं ज आलंबन कराव्युं छे
सर्वज्ञना मार्गमां वीतरागी सन्तोए कई रीते मोक्षमार्ग
साध्यो? तेनी विधि बतावतां आचार्यदेव स्वानुभव सहित कहे छे के
पराश्रित एवा समस्त व्यवहारने छोडीने अने स्वाश्रित एवा सम्यक्
निश्चयरूप शुद्ध आत्मामां एकमां ज निष्कंप रहीने वीतरागमार्गी
संतोए मोक्षमार्ग साध्यो छे, अमे पण ए ज विधिथी मोक्षमार्ग साधी
रह्या छीए...ने जगत पण ए ज एक विधिथी मोक्षमार्गने साधो.
(समयसार कळश १७३ उपरना प्रवचनमांथी)
मोक्षमार्गमां विचरता सन्तो शुं करे छे? ते वात छे. मुनि हो के सम्यग्द्रष्टि
गृहस्थ हो –ते बधा सन्त छे, मोक्षमार्गी छे. असंख्यात समकिती ने करोडो मुनि ते
बधा अंदरमां कई रीते मोक्षमार्गने साधे छे ते अहीं बताव्युं छे. आमां जैनशासननो
नीचोड आवी जाय छे.
प्रथम तो, सम्यग्द्रष्टि जीवराशि एटले के सम्यग्द्रष्टि जीवोनो समूह महिमावंत
एवा पोताना शुद्ध चैतन्यस्वरूपमां लीन थईने परम सुखने अनुभवे छे; शुद्धस्वरूपमां
एकाग्रता वडे ज सुख छे; कोईपण पराश्रयभावमां सुख नथी. पराश्रितभाव ते तो
दुःख छे; माटे बधोय पराश्रयभाव छोडवानो भगवाननो उपदेश छे, ने एकला शुद्ध–

PDF/HTML Page 6 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : ३ :
स्वरूपना अवलंबननो भगवाननो उपदेश छे. आनाथी विरुद्ध माने, व्यवहारना
आश्रयथी लाभ माने, तो तेणे भगवानना स्वालंबी उपदेशने जाण्यो नथी.
भगवाननो उपदेश तो स्वालंबननो एटले के शुद्धात्माना आश्रयनो छे; एम करे तेणे
ज भगवानना उपदेशने यथार्थ झील्यो कहेवाय.
अहो! सर्वज्ञ भगवाननो आवो उत्तम उपदेश सांभळीने सम्यग्द्रष्टिजीवो
शुद्धात्मामां स्थिर थईने सुखने केम न अनुभवे? सम्यग्द्रष्टि तो शुद्धात्मानो आश्रय
करीने आनंदने अनुभवे छे. –एटले सम्यग्द्रष्टि थवानी पण आ ज रीते छे के
व्यवहारनो आश्रय छोडीने शुद्धआत्मानो आश्रय करवो, –ए पण आमां आवी गयुं.
भाई! तारे जन्म–मरणनां दुःखोनो अंत लाववो होय ने परम सुखनो अनुभव करवो
होय तो परथी अत्यंत भिन्न आत्माने जाणीने तेमां ज स्थिरता कर.
भगवाननो यथार्थ उपदेश सांभळतां पोताना शुद्धस्वरूपनो परम महिमा आवे
छे ने रागनो महिमा रहेतो नथी. एटले धर्मीजीव रागादि साथे एकताबुद्धि सर्वथा
छोडीने, पोताना शुद्धस्वरूपमां ज एकाग्र थईने तेना अनुभवथी सम्यग्दर्शन–ज्ञान–
चारित्र प्रगट करे छे. आ रीते शुद्धात्माना आश्रये मोक्षमार्ग छे माटे तेनो आश्रय
करवा जेवो छे; ने जेटला पराश्रित व्यवहारभावो छे ते बधा मोक्षमार्ग नथी पण
बंधमार्ग छे माटे ते बधानो आश्रय छोडवा जेवो छे. अहो, आवो स्पष्ट मार्ग
भगवाने दिव्यध्वनि द्वारा समवसरणमां बताव्यो ने गणधर वगेरे सन्तोए ते झील्यो,
ने जगतना जीवोने उपदेश्यो. आवा मार्गनो निश्चय तो करो!
स्वाश्रित मोक्षमार्गना साचा निश्चय वडे पराश्रयबुद्धि छूटे छे ने परिणतिनुं
वलण अंतर्मुख ढळे छे. सर्वे अरिहंतोए शुद्धआत्माना आश्रये ज मोक्षमार्ग कह्यो छे,
रागना आश्रये के शरीरना आश्रये मोक्षमार्ग कह्यो नथी. मोक्ष कोण पामे? के जे
निश्चयरूप शुद्धात्मानो आश्रय करे ते; ‘‘निश्चयनयाश्रित मुनिवरो प्राप्ति करे
निर्वाणनी.’’
अहीं तो कहे छे के : आवा शुद्धआत्माना आश्रयनो अने व्यवहारना आश्रयना
त्यागनो उपदेश सांभळतांवेंत धर्मना कामी जीवो पोताना शुद्धस्वरूपने झडपथी आलंबे
छे, जोरथी पोताना स्वभावनुं अवलंबन करे छे...शुद्ध ज्ञानघन स्वभावना महिमामां
पोताना आत्माने एकाग्र करे छे...निष्कंपपणे आक्रमीने शुद्धस्वरूपमां पहोंची जाय छे.

PDF/HTML Page 7 of 45
single page version

background image
: ४ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
धर्मी शुद्धस्वरूपमां आक्रमण करे छे–झडपथी तेमां प्रवेशीने तेनो अनुभव करे छे;
परभावोमां रोकाता नथी पण तेनाथी भिन्न थईने शुद्धस्वरूपने पहोंची वळे छे–
अनुभवमां ल्ये छे. सम्यक् निश्चयने एकने ज अनुभवीने शुद्धज्ञानघनना महिमामां
ज्ञान स्थिर थयुं–ते ज शरण छे, ते ज शांति छे, ते ज मोक्षमार्ग साधवानी रीत छे.
‘एक’ एटले बीजा बधायथी निरपेक्ष, जेमां निमित्तनी, रागनी के भेदनी
अपेक्षा नथी एवा शुद्धज्ञानघन निर्विकल्प एक स्वरूपनो ज आश्रय (अनुभव)
करवाथी मोक्षमार्ग सधाय छे. आ सिवाय बीजाना आश्रये मोक्षमार्ग माने तो तेने
मार्गनी विपरीतता छे, एटले के मिथ्यात्व छे. मोक्षमार्गना जे रत्नत्रय छे ते अन्य
द्रव्योथी अत्यंत निरपेक्ष छे ने एक पोताना शुद्धस्वरूपनुं ज तेने अवलंबन छे
एकम्
एव एटले सम्यक् निश्चयने एकने ज अनुभववो–एम कहीने बीजा सघळाय व्यवहार
भावोनो आश्रय जिनभगवाने छोडाव्यो छे.
रागथी तो निवृत्त थवानुं (पाछा वळवानुं) भगवाने कह्युं छे; जो रागमां
एकताबुद्धि करे तो तेनाथी जीव केम पाछो वळे? अने जे जीव रागने मोक्षनुं साधन
माने ते तेमां एकताबुद्धि कर्या विना रहे नहि. अहीं समजावे छे के हे भाई! मोक्षनो
मार्ग तो एक शुद्ध आत्मवस्तुना ज आश्रये छे, अन्य कोईना आश्रये मोक्षमार्ग नथी.
माटे बधाय परनो आश्रय छोडीने सन्तो मात्र एक निर्विकल्प चैतन्य वस्तुने ज
अनुभवे छे. तेनो ज आश्रय करे छे. जेमां रागादि समस्त पराश्रयभावोनो अभाव छे
एवी निर्विकल्प वस्तु, तेना अनुभव वडे सम्यकत्वादि थाय छे ने मिथ्यात्व छूटे छे.
जेटला बहिर्मुखभाव ते मोक्षमार्ग नहि. अंतर्मुख शुद्धआत्माना आश्रयरूप
वीतरागभाव ते ज मोक्षमार्ग छे. मोक्षमार्गरूप आत्मअनुभव, तेमां बीजा कोईनी
मदद–अपेक्षा नथी. विकल्पनीये अपेक्षा नथी. आवो परम निरपेक्ष मोक्षमार्ग छे.
जेम स्व–परनी एकताबुद्धिरूप मिथ्याभाव बंधनुं कारण होवाथी भगवाने ते
मिथ्याभाव छोडाव्यो छे, तेम शुभाशुभ जेटला पराश्रय भावो छे ते बधाय पण
बंधनुं ज कारण होवाथी भगवाने ते पराश्रयभावो छोडाव्या छे; पराश्रित एवो
बधोय व्यवहार भगवाने छोडाव्यो छे, एटले के तेनो आश्रय छोडीने सम्यक्
निश्चयरूप एक शुद्धआत्मानो ज निष्कंप आश्रय कराव्यो छे; तेना ज आश्रये
मोक्षमार्ग छे. जेटलो शुद्धात्मानो आश्रय छे तेटलो ज मोक्षमार्ग छे; जेटलो
पराश्रयभाव छे तेटलो बंधभाव छे. ज्ञानीने ते पराश्रयभावमां एकत्वबुद्धि छूटी गई
छे तेथी तेनाथी ते छूटो छे–मुक्त छे.

PDF/HTML Page 8 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : ५ :
सम्यक्निश्चयमां लीन, ने व्यवहारथी विमुक्त, एवा सम्यग्द्रष्टि सन्तो मोक्षने
साधे छे. शुद्धआत्माने देखवो–अनुभववो तेने ज जैन शासन कह्युं छे. व्यवहारनो
आश्रय करीने अशुद्धतानो अनुभव करे तेने जैनशासन नथी कह्युं, तेने धर्म नथी कह्यो.
शुद्धवस्तुना अनुभव वगर धर्म केवो? हजी तो शुभराग ते जैनधर्म छे एम माने ते
रागनुं सेवन छोडीने शुद्धवस्तुनुं सेवन क्यांथी करशे? रागनुं सेवन, रागथी कंई पण
लाभबुद्धि, ते तो मिथ्याबुद्धि छे. मोक्षमार्ग तो भगवाने शुद्धात्माना सेवनथी ज कह्यो छे.
अंदरना गुणगुणीभेद संबंधी कोई सूक्ष्म विकल्प, ते विकल्प अंदरना
अनुभवमां जवा माटे कांईक तो सहायकारी थशे! –तो कहे छे के ना; सघळाय
विकल्परूप व्यवहारनो आश्रय छोड, ने शुद्धआत्मानो आश्रय कर त्यारे ज तने
अंतरमां आनंदनो अनुभव थशे ने त्यारे ज मोक्षमार्ग शरू थशे. आ कळशना रचनार
अमृतचंद्राचार्यदेवे ज पुरुषार्थसिद्धिउपाय शास्त्र रच्युं छे; तेमां पण कहे छे के–
‘एवमयं
कर्मकृतैः भावैः असमाहितो अपि युक्त इव प्रतिभाति बालिशानां प्रतिभासः स खलु
भवबीजम् ।’
(गा.१४) आ चैतन्यस्वरूप शुद्धआत्मा छे ते शरीरादिक अने रागादिक
एवा कर्मकृत भावोथी असंयुक्त छे–भिन्न छे, छतां बालिश एटले के अज्ञानी जीवोने ते
रागरूप ने शरीररूप होय एवो प्रतिभास थाय छे; अज्ञानीओनो ते प्रतिभास खरेखर
भवनुं बीज छे.
जुओ, आ भवनुं बीज! तेनी सामे मोक्षनुं बीज शुं ? –के ‘निश्चयनयाश्रित
मुनिवरो प्राप्ति करे निर्वाणनी.’ निश्चयनयवडे देहथी ने रागथी भिन्न एवा पोताना
शुद्धआत्माने अनुभवमां लेवो ते मोक्षनुं बीज छे. तेमां क्यांय रागनी अपेक्षा नथी,
रागथी तो ते असंयुक्त छे. शुद्धआत्मानो अनुभव रागने स्पर्शतो नथी.
रागथी लाभ मानशे ते जीव राग वगरना शुद्धआत्माने केम अनुभवशे? जे
सम्यक् स्वभावमां विकल्प छे ज नहि एने अनुभवमां –श्रद्धामां लेतां कोई विकल्पमां
लाभबुद्धि रहेती नथी. विकल्पनी परवा वगरनो खुद आत्मा पोते पोताने
स्वानुभूतिथी अनुभवे छे, –आवो मोक्षमार्ग भगवाने कह्यो छे. राग–विकल्प के भेदरूप
व्यवहारनो जेटलो आश्रय छे तेटलो तो अशुद्ध भावबंध छे, ते मोक्षनुं कारण थई
शकतो नथी.
अहो, आवा स्वाधीन मोक्षमार्गने कोण न सेवे! सम्यक् निश्चय एवा
निजस्वरूपना महिमामां कोण लीन न थाय? ने रागमां–व्यवहारमां कोण लीन रहे?
सन्तो एटले सम्यग्द्रष्टि साधकजीवो विकल्पथी भिन्न थईने, व्यवहारनो आश्रय
छोडीने, एक

PDF/HTML Page 9 of 45
single page version

background image
: ६ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
सम्यक् निश्चयरूप निजस्वरूपना महिमामां लीन थाय छे–तेने अनुभवे छे. –आ
मोक्षमार्गने साधवानी रीत छे.
जेणे शुद्धआत्माने अनुभवमां लईने मिथ्यात्वभाव छोड्यो एणे शुद्धस्वरूपथी
विरुद्ध एवा समस्त व्यवहारभाव छूटी गया एटले के ते बधाय व्यवहारमांथी
एकत्वबुद्धि तेने छूटी गई छे. विकल्पो ते वीतरागस्वरूपथी विपरीत छे; तेमां क्यांय
एकताबुद्धि सम्यग्द्रष्टिने रहेती नथी. माटे ‘सम्यग्द्रष्टिने व्यवहार नथी’ –एम कह्युं; ते
एक सम्यक् निश्चयरूप शुद्धस्वरूपमां ज तन्मय–लीन छे. आवी अंतरंगद्रष्टि धर्मात्माने
होय छे. धर्मात्मानी आवी अंतरदशाने व्यवहारनी रुचिवाळो ओळखी शके नहि. आ
तो वीतरागी शास्त्रोनो अपूर्व नीचोड छे. शुद्धस्वरूपनो अनुभव करवो ने व्यवहारनो
आश्रय छोडवो ते सर्वे वीतरागीशास्त्रोनुं तात्पर्य छे एटले ते जैनशासननो सार छे ने
ते मोक्षमार्ग छे. आ रीते ज मोक्षमार्ग सधाय छे.

जुओ, वीतरागमार्गी सन्तोए मोक्षमार्ग कई रीते साध्यो तेनी आ वात छे.
त्रणेकाळे सर्वे जीवोने माटे आ एक ज मोक्षनी रीत छे. –‘एक होय त्रणकाळमां
परमारथनो पंथ.’ सम्यक् निश्चयरूप जे पोतानो शुद्धस्वभाव, तेनुं अवलंबन करतां
बीजा बधानुं (भेदनुं–रागनुं–परनुं) अवलंबन छूटी जाय छे. पराश्रयभावमां रागनी
उत्पत्ति छे, तेथी जेटला पराश्रितभावो छे तेमनो मोक्षमार्गमां निषेध छे. शुभराग–
विकल्प होय पण धर्मी तेने मोक्षमार्गरूप नथी जाणता. तेने बंधभाव तरीके जाणीने हेय
समजे छे. जगतमां जे कोई सम्यग्द्रष्टि–जीवराशि छे ते आ प्रकारे ज मोक्षने साधे छे.
सम्यग्द्रष्टि – जीवराशि
संसारमां सम्यग्द्रष्टि–जीवराशि असंख्यात छे.
नरकमां सम्यग्द्रष्टि करतां मिथ्याद्रष्टि असंख्यगुणा छे.
स्वर्गमां सम्यग्द्रष्टि करतां मिथ्याद्रष्टि असंख्यातगुणा छे.
मनुष्योमां सम्यग्द्रष्टि करतां मिथ्याद्रष्टि असंख्यातगुणा छे.
तिर्यंचमां सम्यग्द्रष्टि करतां मिथ्याद्रष्टि अनंतगुणा छे.
नरकमां सम्यग्द्रष्टि असंख्यात छे.
स्वर्गमां सम्यग्द्रष्टि असंख्यात छे.

PDF/HTML Page 10 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : ७ :
मनुष्यमां सम्यग्द्रष्टि संख्यात छे.
तिर्यंचमां सम्यग्द्रष्टि असंख्यात छे.
सिद्धमां तो अनंतजीवो बधाय सम्यग्द्रष्टि छे, मिथ्याद्रष्टि त्यां छे ज नहि.
हवे आ बधा सम्यग्द्रष्टि जीवोनो समूह शुं करे छे? के शुद्धस्वरूपने अवलंबीने
आनंदनो उपभोग करे छे, ने समस्त व्यवहारनुं अवलंबन छोडे छे. शार्दूलसिंहनी जेम
निजानंदनी मस्तीमां विचरे छे.
अत्यारथी मांडीने भविष्यनो अनंतानंतकाळ आत्मिक सुखनो ज अनुभव कर्या
करे– एवुं महा कार्य शुं व्यवहारना अवलंबने थतुं हशे? ना; शुद्धनिश्चयरूप
ज्ञानानंदस्वरूपना अवलंबने ज अनंतकाळनुं महान सुख प्रगटे छे. माटे सन्तो,
सम्यग्द्रष्टि धर्मात्माओ; अतीन्द्रिय सुखना अभिलाषीओ, परम संतोषथी
निजमहिमाथी भरपूर शुद्धस्वरूपमां ज एकाग्रता करे छे. सम्यक्निश्चयरूप निजस्वरूप
सिवाय बीजानो महिमा धर्मीने आवतो नथी. भाई! तेरा पंथ बहारमें नहि, तेरा पंथ
रागमें नहि, तेरा पंथ तारा शुद्धस्वरूपमां ज छे. आवा शुद्धस्वरूपने जेओ अवलंबे छे
तेओ ज भगवानना पंथमां छे. रागथी धर्म माने तेओ भगवानना पंथमां नथी.
शुद्धस्वरूपना वेदनमां रागना वेदननो अभाव छे. जेनो अभाव छे तेना
अवलंबने शुद्धस्वरूपनी प्राप्ति केम थाय? न ज थाय. माटे धर्मात्मा जीवो रागनुं
अवलंबन सर्वथा छोडीने शुद्धस्वरूपना निज महिमामां ज ज्ञानने एकाग्र करे छे.
सत्य वस्तु एटले शुद्ध वस्तु निर्विकल्प छे; कोई विकल्प वडे ते अनुभवमां
आवी शकती नथी, विकल्प तेमां प्रवेशी शकतो नथी. धर्मी जीवो आवी शुद्धवस्तुने
आक्रमे छे एटले के पुरुषार्थ वडे तेमां पहोंची वळे छे, –अंतर्मुख थईने तेमां प्रवेशे छे.
बीजा बधाने छोडे छे ने अंतरमां सम्यक्निश्चयने एकने ज ग्रहण करे छे, –आ ज
मोक्षमार्ग छे, ने आज धर्मात्मानुं चिह्न छे.
शुद्धस्वरूपने अनुभवमां लेतां, ते शुद्धस्वरूपथी विपरीत जे कोई परभावो छे ते
बधा छूटी जाय छे. निश्चयनो आश्रय करतां व्यवहारनो आश्रय छूटी जाय छे. सर्वज्ञना
पंथना केडायती एवा सन्तो आ प्रकारे एक निश्चयना आश्रये मोक्षमार्गने साधे छे.

PDF/HTML Page 11 of 45
single page version

background image
: ८ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
आचार्य भगवान पोते आवा मोक्षमार्गने साधी रह्या छे, ने जगतना जीवोने
एवो स्वाश्रितमोक्षमार्ग देखाडी रह्या छे. भाई! आवा मोक्षमार्ग वगर पराश्रयभावमां
तो तारो अनंतकाळ संसारमां वीत्यो. रागादिभावोने पोताना मानीने अनंतकाळ तें
दुःखमां ज गुमाव्यो. एनाथी छूटवा ने अनंतकाळनुं सुख पामवा माटे मोक्षनो आ महा
पंथ वीतरागी सन्तोए बताव्यो छे तेनुं सेवन कर. स्वभावना सेवनथी जे शुद्धभावो
प्रगट्या तेमां व्यवहारना बंधभाव जरापण छे ज नहि, ते अबंधभाव छे, अबंधभाव
कहो के मोक्षमार्ग कहो.
गुरुदेव स्वाश्रितमार्ग प्रत्येना प्रमोदथी कहे छे के वाह रे वाह! सन्तोए आवो
स्पष्ट मोक्षमार्ग खुल्लो कर्यो छे. निश्चयस्वभावना आश्रये ज मुनिओए मोक्षने साध्यो
छे. ने व्यवहारना आश्रये कदी मोक्ष साधी शकातो नथी. माटे सम्यग्द्रष्टिने सघळाय
व्यवहारनो आश्रय छूटी गयो छे; एने जे शुद्धभाव प्रगट्यो छे तेमां निश्चयनो ज
एकनो आश्रय छे, व्यवहारनो आश्रय तेमांथी छूटी गयो छे...आवी परिणति वडे ज
मोक्षमार्ग सधाय छे. –मोक्षमार्ग साधवानी आ रीत छे.
ज्ञानधारा अने कर्मधारा बंनेनी जात तद्न जुदी छे; ज्ञानधारा ते मोक्षभाव छे,
कर्मधारा ते बंधभाव छे; ज्ञानधारा शुद्धात्माना आश्रये छे, कर्मधारा ते पराश्रये छे.
ज्ञानधारानुं फळ सादिअनंत परम आनंदनी प्राप्ति छे; कर्मधारा ते दुःखरूप छे. आम
बंने धारानी अत्यंत भिन्नतानुं स्वरूप पोताना भावमां स्पष्ट भासवुं जोईए. बंनेने
एकबीजानां भेळवी द्ये, बंधभावना एक अंशनेय मोक्षमार्ग माने–तो तेने मोक्षना
कारणने जाण्युं ज नथी, मोक्षमार्ग तेणे जोयो ज नथी, एटले ते तो बंधनमां ज वर्ते छे.
अहीं ते बंधनथी छूटवानी ने मोक्षमार्ग साधवानी रीत वीतरागी सन्तोए बतावी छे.
देहनो तो संयोग क्षणमां छूटी जशे, –भाई! आवा जीवनमां मोक्षमार्गने
साध...आत्माना स्वरूपनो निर्णय कर...ने अरिहंतदेवना वीतराग मार्गमां आव.
शुद्धआत्माना आश्रय वगर वीतरागमार्गमां अवातुं नथी. वीतरागमार्गमां सन्तोनी
शैली कोई अजब छे! एमना अंदरना भावो अपूर्व गंभीर छे. समयसार कोई अपूर्व
मांगळिक पळोमां जगतना महाभाग्ये रचाई गयुं छे...कुंदकुंदाचार्यदेव स्वानुभवमां
झूलता झूलता अंदर कलम बोळी बोळीने पोन्नूर पर्वत उपर ज्यारे आ समयसार
लखता हशे (ते वखतनी भावभीनी अद्भुत चेष्टा बतावीने गुरुदेव कहे छे के–)
अहो! वीतरागी सन्तोए न्याल कर्या छे!

PDF/HTML Page 12 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : ९ :
मोक्षमार्ग बतावीने संतोए न्याल कर्या छे ने भवभ्रमणथी छोडाव्या छे. आवो
मोक्षमार्ग जाणीने अंदरमां तेनो उद्यम करवा जेवुं छे. आवो मोक्षमार्ग सांभळवा मळवो
ते पण महा भाग्ये मळे छे, ने अंदर तेनो निश्चय करे ते तो न्याल थई जाय एवुं छे.
स्वाश्रये जेटली निर्मळता थई तेटलो ज मोक्षमार्ग छे; ने जेटलो पराश्रयरूप
अशुद्धभाव रहे तेटलुं बंधन छे. –आम जाणीने स्वाश्रयभावमां ठर्यो त्यां तेमां
व्यवहारनो आश्रय छूटी ज गयो छे. स्वाश्रयभाव ने पराश्रयभाव बंनेने एकता कदी
थती नथी, बंने भिन्न ज छे. आवी भिन्नतानुं भान थवुं तेमां मोक्षमार्गनी शरूआत
छे. वारंवार भावना घूंटीने आ भावो अंतरमां द्रढ करवा जेवा छे, आत्मामां एना
संस्कार पडतां अपूर्व कल्याण थाय छे. ने मोक्षमार्ग सधाय छे.
आ रीते शुद्धात्माना स्वाश्रये मोक्षमार्ग साधवानी विधि वीतरागमार्गमां
सन्तोए प्रसिद्ध करी छे. आ विधिथी निश्चयना अवलंबने मोक्षमार्ग साधवो ते मुमुक्षुनुं
कर्तव्य छे.
जयवंत हो स्वाश्रित मोक्षमार्ग....अने मार्गसाधक वीतरागमार्गी सन्तो।
सोनगढमां श्रावण – भादरवो
सोनगढमां दशलक्षणीपर्युषणपर्व भादरवा सुद चोथ ने मंगळवार
ता.२७–८–६८ थी शरू थशे, अने भादरवा सुद १४ ने गुरुवार ता.प–९–६८ ना रोज
पूरा थशे. (वच्चे एक तिथि घटती होवाथी दसलक्षणीपर्वनो प्रारंभ एक दिवस वहेलो
थाय छे.)
दर वर्षनी माफक धार्मिक प्रवचनना खास दिवसो श्रावण वद १२ ने
बुधवार ता.२१–८–६८ थी शरू थशे.
सोनगढमां दर वर्षनी माफक आ श्रावण मासमां श्रावण सुद पांचमने
मंगळवार ता.३०–७–६८ थी खास प्रौढ वयना भाईओ माटेनो जैन शिक्षणवर्ग शरू
थशे अने श्रावण वद ९ रविवार ता.१८–८–६८ सुधी चालशे. उत्तम श्रेणीमां जैन
सिद्धान्त प्रश्नोत्तरमाळा अने जैन तत्त्वमीमांसा चालशे, तो ते पुस्तको जेमनी पासे होय
तेमणे साथे लाववा. (आ शिक्षणवर्ग मात्र मोटी उंमरना भाईओ माटे छे. अने
वर्गमां मात्र भाईओ ज बेसे छे, बहेनो माटे आ वर्ग नथी.)

PDF/HTML Page 13 of 45
single page version

background image
: १० : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
मोक्षार्थी जीवनुं काम
(कळश १८४–१८प ना प्रवचनमांथी
सिद्धान्तनुं सेवन कई रीते करवुं ?
जे भाव आत्माना स्वभावपणे अनुभवाय ते उपादेय छे.
जे भाव आत्माना स्वरूपपणे न अनुभवाय ते हेय छे.
जे रागादिक परभावो छे तेओ आत्माना चेतनस्वभाव साथे मेळवाळा नथी
पण अणमळता छे.
जेम चेतनभाव अने जडभाव ए बंनेने एकबीजा साथे मळतापणुं नथी पण
अणमळतापणुं छे, जुदी ज जात छे;
तेम ज्ञानभाव ने रागभावने पण मेळ नथी, एकपणुं नथी, पण
अणमळतापणुं छे, भिन्नपणुं छे. शुद्धजीवना स्वरूपपणे ते रागादि
अनुभवाता नथी, माटे तेओ जीवनुं स्वरूप नथी.
–आवो अनुभव ते साचा जीवनो अनुभव छे, ने ते मोक्षनुं कारण छे.
मोक्षार्थी एटले के आत्माना अतीन्द्रियसुखने जे उपादेय समजे छे ते जीवे कोनुं
सेवन करवुं? के हुं शुद्ध एक चैतन्यमात्र छुं–एवा परमार्थनो अनुभव करवो.
सिद्धान्तमां आत्मानो आवो अनुभव करवानुं कह्युं छे माटे मोक्षार्थीए आवो अनुभव
करवो. –एनुं ज नाम सिद्धान्तनुं सेवन छे.
चैतन्यथी भिन्न लक्षणवाळा अनेक भावो ते हुं नथी, एक परमज्ञानप्रकाशी
चैतन्यभाव ज हुं छुं–आवा अनुभवमां ज अतीन्द्रिय सुख छे. माटे अतीन्द्रियसुखना
अभिलाषी जीवो आवा आत्मानुं सेवन करो. परम ज्ञानप्रकाशी आत्मा
स्वसंवेदनप्रत्यक्ष छे. ज्ञाननुं लक्षण शुं ने रागनुं लक्षण शुं–एम बंनेना भिन्न लक्षणने
ओळखीने, शुद्धचैतन्यलक्षणस्वरूपे पोताने अनुभववो ते मोक्षार्थीनुं काम छे. ते
मोक्षनो मार्ग छे.

PDF/HTML Page 14 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : ११ :
क्यां ज्ञान ने क्यां राग? क्यां परम अतीन्द्रियसुख ने क्यां आकुळता? बंनेने
मेळ नथी. अंतरनी शांतिना प्रवाहमां रागनी भेळसेळ नथी. अनुभवना अमृतमां
आकुळतानुं झेर नथी.
अतीन्द्रियसुख कहो के आत्मानो स्वभाव कहो, तेनो जेने प्रेम जाग्यो, ते सुख
ज जेने उपादेय लाग्युं, ते जीवने जगतना बीजा कोई बाह्य विषयो ने पाप–पुण्यना
भावो रुचिकर न लागे; तेने ते उपादेय न समजे. वीतरागी मोक्षसुखनो अभिलाषी
रागने केम सेवे? ते तो परभावोथी रहित एवा पोताना शुद्धस्वरूपने ज सेवे छे. –
आवुं सेवन ते ज सिद्धान्तनुं साचुं सेवन छे.
हुं तो एक शुद्ध चिन्मात्रभाव ज छुं, अन्य कोई भावो मारा नथी. –एवुं
शुद्धात्मानुं सेवन एटले के अनुभवन ते ज सिद्धान्तनुं सेवन छे.
राग ने पुण्य मारां, तेनाथी मने सुख मळशे–एवुं जे रागनुं सेवन छे ते
सिद्धान्तनुं सेवन नथी, तेमां तो सिद्धान्तनो अनादर छे.
सिद्धान्ते आत्मानो परमार्थस्वभाव देखाड्यो छे; ते स्वभावनुं सेवन ते
स्वसन्मुख पर्याय छे. ए ज धर्मात्मानुं आचरण छे...एमां ज परम अतीन्द्रियसुखनुं
वेदन छे.
जीवे अनादिथी विकारी परभावोनुं ज सेवन कर्युं छे, तेने ज पोतापणे
अनुभव्या छे; तेमां एकपण क्षण जो भंग पाडे तो स्वभावसन्मुखता थई जाय. जेम
अज्ञानथी निरंतर रागने अनुभव्यो, तेम हवे ‘रागादि ते हुं नथी, शुद्ध चैतन्यभाव ज
हुं छुं’ एम निरंतर शुद्धात्मानुं सेवन करो, तेने ज पोतापणे अनुभवमां ल्यो. –आवो
अनुभव ते ज मोक्षनुं कारण छे, ते ज मोक्षार्थी जीवे करवानुं कार्य छे. ए सिवाय पुण्य
के पुण्यफळरूप भोगो, संसार के शरीर–तेनी अभिलाषा मोक्षार्थी धर्मात्माने नथी.
स्वसंवेदन प्रत्यक्ष एवुं जीवद्रव्य हुं छुं, शुद्धज्ञानप्रकाशमय हुं छुं, अतीन्द्रियसुख ते हुं छुं–
आवा श्रद्धा–ज्ञान–अनुभव धर्मी करे छे. धर्मीना आवा कार्य साथे रागादि अशुभभावो
अणमळता छे. शुद्धस्वरूपने रागादि साथे मेळ नथी–मिलन नथी–एकता नथी,–पण
भिन्नता छे. जेटला रागादिभावो छे ते बधाय शुद्धचैतन्यना अनुभवथी पर छे; ते
पोताना स्वरूपपणे नथी अनुभवाता. माटे हे मोक्षार्थी जीवो! तमे आवा शुद्धस्वरूपना
अनुभवरूप सिद्धान्तनुं सेवन करो.

PDF/HTML Page 15 of 45
single page version

background image
: १२ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
मोक्षनुं कारण प्रज्ञा
प्रज्ञा एटले शुद्धात्मसन्मुख झुकेली भगवती चेतना
(समयसार कळश १८१ उपरना प्रवचनमांथी)
भगवती प्रज्ञाद्वारा भेदज्ञान करावीने मोक्षमार्ग
खोलनार आ आनंददायक कळश ज्यारे ज्यारे गुरुदेवना
श्रीमुखथी सांभळीए छीए त्यारे एवी ‘ज्ञानचेतना’ना
पुरुषार्थनी तीव्र प्रेरणा जागे छे.
अनादिथी बंधनमां बंधायेला आत्माने कई रीते छोडाववो? छूटकारानुं साधन
शुं? ते रीत आ कळशमां बतावे छे. भेदज्ञान माटे आ अलौकिक श्लोक छे. आत्माने
बंधनथी छूटवानुं साधन आत्मामां छे, आत्माथी जुदुं बीजुं कोई साधन नथी. आत्मा
शुं ने बंध शुं–ए बंनेना भिन्नलक्षणने ओळखीने जे चेतना आत्मस्वभाव तरफ झूकी
ते भगवती चेतना ज बंधनथी छूटवानुं (एटले के मोक्षनुं) साधन छे. रागादि
बंधभावो तो आत्मस्वभावथी जुदा छे; ते कोई पण रागभाव आत्माने मोक्षनुं कारण
थतुं नथी. ते रागभावोने तो आत्माथी भिन्न करवाना छे. रागथी जुदी एवी जे
चेतना (–के जे आत्मानुं स्वलक्षण छे) तेना वडे ज बंधनथी भिन्न आत्मा
अनुभवमां आवे छे; आ रीते चेतनारूप भगवती प्रज्ञा ज मोक्षनुं कारण छे. जीवनुं
पोताना शुद्धस्वरूपे परिणमवुं, ने एवुं परिणमन थतां कर्मनो संबंध छूटी जवो तेनुं
नाम मोक्ष छे. मोह–राग–द्वेषादि अशुद्ध परिणतिरूपे परिणमन थवुं ने कर्मनो संबंध
थवो तेनुं नाम बंध छे. शुद्धपरिणमन एटले शुद्धस्वरूपनो अनुभव; जे ज्ञान वडे आवो
अनुभव थाय ते ज्ञान मोक्षनुं साधन छे. आवो अनुभव थतां शुद्धपरिणमन थयुं
एटले अशुद्धपरिणमन छूटी गयुं ने पुद्गलमां कर्म अवस्था छूटी गई. –शुद्धजीव
पोताना स्वरूपमां रह्यो–ते दशानुं नाम मोक्ष छे. –‘मोक्ष कह्यो निज शुद्धता.’
आवा मोक्षनो उपाय शुं? मोक्ष ते पूर्णशुद्धपरिणमन छे, ने तेनुं कारण पण
शुद्धता ज छे. अशुद्धतानो कोई अंश मोक्षनुं कारण थाय नहि. मोक्षना साधननो बहु
सरस खुलासो आ ‘प्रज्ञाछीणी’ ना श्लोकमां कर्यो छे.
तीक्ष्ण प्रज्ञाछीणी एटले तीखी ज्ञानचेतना, उग्र ज्ञानचेतना; तेने निपुणजीवो
एटले भेदज्ञानमां अत्यंत प्रवीणजीवो, सावधान थईने आत्मा अने बंधनी वच्चेना

PDF/HTML Page 16 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : १३ :
सूक्ष्मभेदमां एवी रीते पाडे छे के शीघ्रपणे बंने अत्यंत जुदा अनुभवमां आवे
छे; ज्ञानचेतना अंतर्मुख थईने पोताना आत्माने रागवगरनो शुद्ध अनुभवे छे. आवो
अनुभव ते ज मोक्षनुं साधन छे. ज्ञाननी साथे जे रागने भेळवे–तेने शुद्धतानो
अनुभव थतो नथी, भेदज्ञान थतुं नथी, मोक्षमार्ग थतो नथी. शुद्धपरिणमन ते रागथी
सर्वथा जुदुं छे. सर्वथा राग वगरनो शुद्धअनुभव ते ज मोक्षसाधन छे. रागमां ऊभो
रहीने शुद्धने अनुभवी शकाय नहि.
साधकदशा वखते पण जेटला रागादिभावो छे ते बधाय ज्ञानचेतनाथी जुदा छे, ते
कोई जीवनुं शुद्धपरिणमन नथी. जीवनुं शुद्धपरिणमन तो ज्ञानचेतनारूप ने
अनंतचतुष्टयरूप छे; ते रागथी सर्वथा जुदुं छे. द्रव्यना स्वभावनी जातनुं परिणमन होय
तेने ज द्रव्यनुं शुद्धपरिणमन कह्युं; रागादि अशुद्धताने द्रव्यनुं शुद्धपरिणमन कहेता नथी. आ
रीते ज्ञानपरिणमन अने रागपरिणमननी सर्वथा भिन्नता छे. रागनो एक्क्ेय अंशज्ञानना
परिणमनमां नथी; ने ज्ञाननो एक्केय अंश रागमां नथी. राग ते शुद्धआत्मानुं परिणमन
ज नथी तो पछी ते आत्मानी शुद्धतानुं साधन केम थाय ? –न ज थाय.
भाई, तारा मोक्षनुं साधन तारामां छे, तेने तुं ओळख तो खरो? तारी
शुद्धताना भान वगर तुं कोने मोक्षनुं साधन बनावीश? मोक्षनुं साधन पोतामां छे तेने
जाण्या वगर जीवे अज्ञानभावथी शुभरागने मोक्षनुं साधन मानीने अनादिकाळथी ते
बंधभावनुं ज सेवन कर्युं छे, एटले मिथ्यात्वने ज सेव्युं छे. रागथी पार एवी
निर्विकल्प अनुभूति मोक्षसाधन छे. ते निर्विकल्प अनुभूति वचनमां आवती नथी, ते
वीतरागपरिणतिनी शी वात? अंतर्मुख थयेलुं स्वसंवेदन ज्ञान आत्माने शुद्धतारूप
परिणमावे छे, ने ते ज मोक्षनुं कारण छे. एकलुं बहारनुं जाणपणुं पण मोक्षनुं कारण
नथी त्यां रागनी तो शी वात? ज्ञान केवुं, –के वीतराग परिणतिरूपे परिणमेलुं
स्वसंवेदनज्ञान ते मोक्षनुं कारण छे.
शुद्धपरिणमन ते मोक्षमार्ग छे.
शुद्धपरिणमन तेने ज होय छे के जेने शुद्धस्वरूपनो अनुभव जरूर होय.
शुद्धस्वरूपना अनुभव वगर जरापण शुद्धपरिणमन थाय नहि, ने शुद्धपरिणमन वगर
चोथुंगुणस्थान पण न थाय. चोथा गुणस्थानथी ज शुद्धस्वरूपनो अनुभव छे,
शुद्धपरिणमन छे, मोक्षमार्ग छे; तेने अंतरात्मा कह्या छे. चोथा गुणस्थाने शुद्धस्वरूपनो
अनुभव होवानी जे ना पाडे तेने अनुभवदशानी के चोथागुणस्थाननी खबर नथी,
तेने मोक्षमार्गनी खबर नथी.
भाई! शुद्धपरिणमन वगर राग अने ज्ञाननी भिन्नताने जाणी शकाय नहि.
राग अने ज्ञाननी भिन्नताने यथार्थ जाणतां शुद्धपरिणमन थया वगर रहे नहि.

PDF/HTML Page 17 of 45
single page version

background image
: १४ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
राग अने ज्ञानने खरेखर त्यारे ज जुदा जाण्या के ज्यारे रागथी जुदो परिणमे
ने ज्ञानस्वभाव तरफ झूके; आ रीते भेदज्ञान थतांवेंत शुद्धतारूप परिणमन थाय ज छे.
आवुं परिणमन थयुं त्यारे ज मोक्षमार्ग शरू थयो.
* * *
भगवतीचेतना कहो के प्रज्ञाछीणी कहो, तेना वडे बंधनथी जुदो शुद्ध आत्मा
अनुभवाय छे. शुद्ध आत्मा चेतनामात्र वस्तु छे. तेमां राग–द्वेष–मोहादि अशुद्धभावो
एकमेक नथी, पण बंने वच्चे संधि छे–सांधो छे, लक्षणभेद छे. एकक्षेत्रे होवा छतां बंने
एकस्वभावे नथी, बंनेना स्वभाव वच्चे मोटो आंतरो छे. ते आंतरो लक्षमां लईने
प्रज्ञाछीणी एवी पडे छे के अशुद्धताने एकबाजु करीने, शुद्धचेतनावस्तुमां पोते एकाग्र
थाय छे. –आनुं नाम भेदज्ञान, ने आ मोक्षमार्ग.
बंधननुं स्वरूप, बंधनथी छूटवानो उपाय–ए बधाना मात्र विचार कर्या करे–
विकल्प कर्या करे तेथी कांई बंधन छूटे नहि. बंधथी भिन्न एवा शुद्धात्माने जाणीने तेमां
ज्ञानने एकाग्र करतां बंधभावो छूटी जाय छे. तेने माटे उपयोगमां सावधानी जोईए.
रभसात् एटले झडपथी प्रज्ञाछीणी पडे छे–एम कहीने पुरुषार्थनी तीव्रता बतावी छे.
आवुं भेदज्ञान करे ते जीवने निपुण कह्यो छे. बाकी बहारना जाणपणामां निपुणता
बतावे ने अंदरमां रागथी जुदा शुद्धात्मानो अनुभव करतां जो न आवडे तो तेने निपुण
कहेता नथी, ते ठोठ छे, आत्माने बंधनथी छोडाववानी विद्या तेने आवडती नथी.
भाई, आत्मानो शुद्धस्वभाव, अने अशुद्धतारूप बंध ते बंने एकमेक थया नथी
पण वच्चे लक्षणभेदरूप सांध छे, एटले बंनेने जुदा अनुभवी शकाय छे, सूक्ष्म
ज्ञानछीणी वडे तेमने जुदा पाडी शकाय छे. आत्मा अने बंध बंने एवा एकमेक नथी
थई गया के वच्चे ज्ञानछीणी न पेसी थशे; बंने वच्चेनो भेद ज्ञानवडे जाणी शकाय छे;
भेदज्ञानवडे बंनेने भेदी शकाय छे.
जेटला क्षेत्रमां चेतनवस्तु छे, तेटला ज क्षेत्रमां रागादि बंधभावो छे, छतां बंने
वच्चे भावभेदरूप (लक्षणभेदरूप) मोटी तिराड छे. आ रागनो स्वाद आकुळतारूप–
दुःखरूप छे, ने ज्ञाननो स्वाद तो शांत–सुखरूप छे, एम विवेकद्वारा बंनेना स्वादनी
भिन्नता जणाय छे; तीखी प्रज्ञाद्वारा ते बंनेने अत्यंत भिन्न जाणीने ते प्रज्ञा
शुद्धस्वरूपमां पेसीने तेने अनुभवमां ल्ये छे, ने रागादिने जुदा करी नांखे छे.
तीखी प्रज्ञा–तीखुं ज्ञान, एटले रागथी घेराय नहि एवी चेतना; ते अंतरना
चैतन्यस्वभावमां प्रवेशी जाय छे; अत्यंत सावधानी वडे–उपयोगनी जागृति वडे अंदरनी
सूक्ष्मसांधने भेदीने एककोर ज्ञानस्वरूप आत्मा, ने बीजीकोर अज्ञानरूप एवा बंधभावो,
तेमने सर्वथा जुदा करी नांखे छे. बंधभावना कोई अंशने ज्ञानमां रहेवा देती नथी,

PDF/HTML Page 18 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : १५ :
ने ज्ञानना कोई अंशने बंधभावमां भेळवती नथी. आवी भगवती ज्ञानचेतना ते
मोक्षनुं साधन छे.
जोके रागादि अशुद्धभावो जीवनी पर्यायमां परिणमे छे–ज्यां जीव छे त्यां ज
रागादि छे, तेथी तेमनाथी भिन्न एवा शुद्धजीवनो अनुभव सामान्य जीवोने कठण छे–
घणो सूक्ष्म छे, तोपण निपुण पुरुषो अंतरनी सूक्ष्म ज्ञानचेतनावडे स्वभाव अने
विभाव वच्चेनो भेद जाणीने तेमनी भिन्नतानो अनुभव करे छे; केमके बंने वच्चे
लक्षणभेदनी तीराड छे. स्थूळज्ञानथी अज्ञानीने ते तीराड नथी देखाती पण ज्ञाननी
अंतर एकाग्रतावडे ते बंने वच्चेनी सांध जाणीने, ज्ञान पोताना स्वभावमां एकाग्र
थाय छे. एकाग्र थतां ज बंने स्पष्ट भिन्न जुदा अनुभवमां आवे छे; ज्ञाननो अनुभव
थयो ते अनुभवमां रागनी सर्वथा नास्ति छे. प्रथम आवी भिन्नता अनुभवतां
सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान थाय छे; पछी सकळ रागादिनो तथा कर्मनो क्षय थवाथी
बंधने सर्वथा छेदीने साक्षात् मोक्षदशा प्रगट थाय छे. आ रीते प्रज्ञा छीणीवडे बंधनने
छेदीने आत्मा मुक्त थाय छे. माटे प्रज्ञारूप ज्ञानचेतना ते मोक्षनो पंथ छे.
अंतरमां ज्ञान अने राग वच्चेनी सांध पकडवी ते माटे उपयोगमां घणी सूक्ष्मता
जोईए. ईन्द्रियो ने मन बंनेथी छूटीने अतीन्द्रिय उपयोग वडे रागथी जुदो आत्मा
अनुभवाय छे. आमां अंर्तमुख उपयोगनो घणो प्रयत्न छे. देह–मन–वाणी तथा
जडकर्म–ते तो जीवथी एकक्षेत्रे होवा छतां भिन्न प्रदेशवाळा छे, रूपी छे, जड छे, ते
नवा आवे छे ने जाय छे–एटले ते तो जीवथी भिन्न छे–एवी प्रतीति विचार वडे
ऊपजे छे. पण अंदरमां जीवनी पर्याय साथे एक प्रदेशे रहेला जे रागादिभावो,
तेमनाथी भिन्न शुद्धजीवनो अनुभव कठण छे, –कठण होवा छतां सूक्ष्म प्रज्ञा वडे तेमनी
वच्चेना स्वभाव भेदने जाणीने भिन्नतानो अनुभव थई शके छे. कठण छे–पण
अशकय नथी, थई शके तेवुं छे. ने आवी भिन्नतानो अनुभव करावनारी भगवती
प्रज्ञा ते ज मोक्षसाधन छे. अनंता जीवो एवो अनुभव करीने मोक्ष पाम्या छे.
प्रज्ञाछीणी वडे विचार करतां अंतरमां एम प्रतीत थाय छे के राग जुदो ने हुं
जुदो; राग वगरनो आत्मलाभ संभवे छे; रागना अभावमां आत्मानो अभाव थई
जतो नथी, रागना अभावे पण आत्मा पोताना चेतनस्वरूपे जीवे छे. माटे
चेतनास्वरूप ज जीव छे, रागस्वरूप नथी.–आवुं अंदरनुं भेदज्ञान अत्यंत कठण होवा
छतां अंदरना तीव्र प्रयत्नवडे थई शके छे. रागना काळे ज तेनाथी भिन्न शुद्धजीवनो
अनुभव ज्ञानचेतना वडे जरूर थाय छे. ज्ञानचेतना अति सूक्ष्म छे, चक्रवर्तीनी
तलवारनी तीखी धारनी जेम एक झाटके ते प्रज्ञाछीणी ज्ञान अने रागना बे कटका करी
नांखे छे. आवुं भेदज्ञान करतां प्रज्ञाछीणीने केटली वार लागे? –तो कहे छे के

PDF/HTML Page 19 of 45
single page version

background image
: १६ : आत्मधर्म : अषाड : २४९४ :
तत्क्षण एक समयमां ते आत्मा अने बंधने जुदा करी नांखे छे. चेतना ज्यां अंतरमां
एकाग्र थई के ते ज समये ते बंधभावोथी जुदा शुद्धआत्माने अनुभवे छे. आवुं
भेदज्ञान निपुण पुरुषो करे छे; निपुण पुरुषो एटले आत्मानुभवमां प्रवीण जीवो; –
पछी ते पुरुष हो के स्त्री हो, स्वर्गनो देव हो के नरकनो नारकी हो; आत्मानो अनुभव
करवामां प्रवीण छे ते जीवो निपुण छे, मोक्षने साधवानी कळा तेने आवडे छे...एने
संसारनो किनारो नजीक आवी गयो छे. आवा भेदज्ञाननिपुण जीवो प्रज्ञाछीणी वडे
बंधथी भिन्न शुद्ध आत्माने साधे छे. आवुं भेदज्ञान जीवने आनंद उपजावे छे.
भेदज्ञान थतांवेंत ज आनंदरूप शुद्धआत्मा अनुभवमां आवे छे, ने बंधभावो
शुद्धस्वरूपथी बहार जुदा रही जाय छे. आ मोक्षमार्ग छे.
वाह! सन्तो आवुं भेदज्ञान करावीने कहे छे के भाई! तुं अंतरमां आवुं भेदज्ञान कर.
आ भेदज्ञान तने महा आनंद उपजावशे ने मोक्ष पमाडशे. भेदज्ञान माटेनो आ अवसर छे.
अनादिना बंधनथी छूटीने सुखी थवा माटेनो आ वखत छे. तुं आ वखतने चूकीश मा.
* * *
गुरुदेव परम वात्सल्यभरी प्रेरणाथी कहे छे के हे भाई! अत्यारे आत्मज्ञान
माटेनो आ अवसर छे....तुं आ वात लक्षमां तो ले. मांड आवा टाणां मळ्‌या छे...तेमां
करवानुं तो एक आ ज छे. अंदरमां जरा धीरो थई, बहारना कार्योनो रस छोडी,
विचार करे तो तने जणाशे के आत्मानो स्वभाव अने राग बंने एक थईने रहेवा
योग्य नथी पण जुदा पडवा योग्य छे. बंनेनो स्वभाव जुदो छे तेथी जुदा पडी जाय छे.
भाई! समय–समय करतां काळ तो चाल्यो ज जाय छे; तेमां जो तुं तारा स्वभाव–
सन्मुख न थयो तो तेें शुं कर्युं ? जे करवा जेवुं कार्य छे ते तो आ ज छे. गमे तेटला
प्रयत्न वडे पण विकारथी भिन्न चेतननो अनुभव करवो–ते ज करवानुं छे.
तारी चेतना रागने चेतवामां (अनुभववामां रोकाय छे तेने बदले चेतना
अंदरमां वळी शुद्धआत्माने चेते–अनुभवे के तरत ज आत्मा अने बंधनी भिन्नतानो
अनुभव थाय छे. –एक समयमां ज आवो उपयोगपलटो थई जाय छे.
दुनियाना जीवो दुनियाना बाह्यकार्योमां पोतपोतानुं डहापण ने प्रवीणता देखाडे
छे....तो हे भाई! तुं तारा आत्माना अनुभवमां प्रवीण था....तेमां उद्यमी था, तारी
चेतनाने रागथी जुदी करीने शुद्ध स्वरूपमां पेसाड...ते क्षणे ज तने परम आनंद थशे.
भेदज्ञानमां निपुण जीवो आनंदसहित पोताना शुद्धआत्माने अनुभवे छे. –आवो
अनुभव ते मोक्षमार्ग छे, ते करवा जेवुं काम छे.
अहा! सावधान थईने आत्माना विचारनो उद्यम करे तेमां तो ऊंघ ऊडी जाय
तेवुं छे. जेने सम्यग्दर्शन प्रगट करवुं छे ते तो आत्मा अने बंधनी भिन्नताना

PDF/HTML Page 20 of 45
single page version

background image
: अषाड : २४९४ : आत्मधर्म : १७ :
विचारमां जागृत छे, –उत्साही छे, तेमां प्रमादे थता नथी. मारे मारुं हित साधवुं छे,
मारे मारो आत्मा प्राप्त करवो छे, मारे मारा आत्माने भवबंधनथी छोडाववो छे–एम
अत्यंत सावधान थईने, महान उद्यमपूर्वक हे जीव! तुं तारा आत्माने बंधनथी जुदो
अनुभवमां ले....अनादिनी ऊंघ ऊडाडीने जागृत था.
आत्माना अनुभव माटे सावधान थाजे....शूरवीर थाजे....जगतनी प्रतिकूळता
देखीने कायर थईश नहि...प्रतिकूळता सामे न जोईश, शुद्धआत्माना आनंद सामे जोजे.
शूरवीर थईने– उद्यमी थईने आनंदनो अनुभव करजे. ‘हरिनो मारग छे शूरानो’...ते
प्रतिकूळतामां के पुण्यनी मीठासमां कयांय अटकता नथी; एने एक पोताना आत्मार्थनुं
ज काम छे. ते भेदज्ञानवडे आत्माने बंधनथी सर्वथा प्रकारे जुदो अनुभवे छे. आवो
अनुभव करवानो आ अवसर छे –भाई! तेमां शांतिथी तारी चेतनाने अंतरमां
एकाग्र करीने त्रिकाळी चैतन्यप्रवाहरूप आत्मामां मग्न कर....ने रागादि समस्त
बंधभावोने चेतनथी जुदा अज्ञानरूप जाण. आम सर्वथा प्रकारे भेदज्ञान करीने तारा
एकरूप शुद्धआत्माने साध. मोक्षने साधवानो आ अवसर छे.
अहो, वीतरागना मारगडा....जगतथी जुदा छे. जगतना भाग्य छे के
संतोए आवो मारग प्रसिद्ध कर्यो छे. आवो मारग पामीने हे जीव! भेदज्ञान वडे
शुद्धआत्माने अनुभवमां लईने तुं मोक्षपंथे आव.
शुं दोष मुजमां छे अरे....सांभळुं छतां समजुं नहि?
वांचुं सदा सद्ग्रंथ....स्वानुभूति कां थाय नहि?
स्व–पर भिन्न कहुं छतां उपयोग स्वमां आवे नहि,
जीवन पळो खूटी रही, क्यम काम पूरुं थाय नहि?