Atmadharma magazine - Ank 309
(Year 26 - Vir Nirvana Samvat 2495, A.D. 1969)
(Devanagari transliteration).

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पु. गुरुदेवनी मंगल छायामां सौ साधर्मीओना सहकारथी आपणुं आत्मधर्म विकसी
रह्युं छे. V. P. कर्यां वगर पण एना लगभग बधा ग्राहको पोतानुं लवाजम वेलासर मोकली
आपे छे, एटलुं ज नहि, तेनी ग्राहकसंख्या पण वधती जाय छे. गुरुदेवना प्रवचनोनी जे
अमूल्य वानगी तेमां अपाय छे तेनो लाभ हजारो जिज्ञासुओ होंशे होंशे लई रह्या छे.
विशाळ संख्यामां अध्यात्मरसिक वांचकवर्ग ए ‘आत्मधर्म’ नुं खास गौरव छे.
आत्मधर्म ए कोई लौकिक छापा जेवुं छापुं नथी परंतु ए वीतरागधर्मनो सन्देश
आपनार उच्च कोटिनुं आध्यात्मिक पत्र छे; तेमां आवता लेखोनी पसंदगी गंभीर
विचारणापूर्वक अने श्री देव–शास्त्र–गुरुनी पुरेपूरी मर्यादा जाळवीने करवामां आवे छे.
कई रीते जैनशासननी वधु ने वधु प्रभावना थाय, ने कई रीते वधु ने वधु जिज्ञासु
जीवो तेनो लाभ ल्ये–एवी भावनाथी तेनुं संपादन थाय छे. अने अमने संतोष छे के
भारतना जिज्ञासु जीवोए पण आत्मधर्मने एवा ज प्रेमथी ने बहुमानथी अपनाव्युं छे.
आत्मधर्ममां अवारनवार प्रसंगोचित लेखो पण आपवामां आवे छे. जेमके
चंद्रलोक संबंधी अत्यारे जे अंधाधुंध प्रचार चाली रह्यो छे ते संबंधमां जैनसिद्धांत अनुसार
साची हकीकत शुं छे–ते वात शास्त्राधारपूर्वक स्पष्ट करवामां आवी, –ते वांचीने आपणा
सेंकडो–हजारो शिक्षित भाई–बहेनोने जैनसिद्धांत प्रत्ये विश्वासनुं कारण थयुं छे, ने अनेक
जीवोनी शंकाओनुं निराकरण थयुं छे. आजना वातावरणमां केटलाय जीवो एवी द्विधामां
रहेता हता के आजनुं विदेशी विज्ञान कहे छे ते साचुं हशे के आपणा जैन सिद्धांतमां कह्युं छे
ते साचुं हशे? –आवी परिस्थितिमां सिद्धांत अनुसार सत्य हकीकत जाणवाथी केटलाय
जीवोनी द्विधा मटी छे, ने ते संबंधी अनेक प
त्रो आवेला छे.
आत्मधर्मनो वांचकवर्ग विशाळ छे अने विचारक पण छे. संपादक समस्त
वांचकोने पोताना एक साधर्मी कुटुंब समान गणे छे; तथा विविध वांचको तरफथी
आत्मधर्मना विकास माटे आवता सूचनोने प्रेमपूर्वक आवकारे छे... अने एवा सूचनो
मोकलवा माटे सौने हार्दिक आमं
त्रण छे. –जय जिनेन्द्र
– ब्र. ह. जैन

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फोन नं. : ३४ “आत्मधर्म” Regd. No. G. 182
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सुख एटले आत्मा
रूपियाथी सुख नथी मळतुं
(१) अनंता रूपिया कोई पासे होई न शके, पण अनंतगुणो दरेक जीव पासे छे;
केमके स्थूळ रूपिया तो आखा लोकमां पण असंख्य ज समाई शके, अनंत रूा.
लोकमां समाय ज नहि. अनंतगुणो तो एकेक जीवमां सदाय वसेला ज छे.
(२) माटे हे जीव! आवा तारा निजगुणनिधानने तुं संभाळ! –रूपिया वगर ज
तेमां परम सुख भरेलुं छे.
(३) तारा निजवैभवनी संभाळमां तने एवुं सुख थशे के जेमां रूपियानी जरूर
ज न पडे.
(४) पोतानुं सहज सुख भूलीने वेचातुं सुख लेवा जवुं ते मुर्खाई छे.
(प) जेम ज्ञान बजारमां वेचातुं मळतुं नथी तेम सुख पण बजारमां पैसाथी
वेचातुं मळतुं नथी.
(६) ज्ञाननी जेम सुखगुण आत्मानो छे, जडनो नथी.
(७) जडमां सुख मानतां चेतननुं साचुं सुख भुलाय छे.
(८) जडमां सुख कोण शोधे? जे दुःखी होय, ने पोतामां सुख न देखे, ते जडमां
सुख शोधे. पोतामां सुख जेणे देख्युं होय ते परमां सुख शोधे नहीं.
(९) सुख ते आत्मा छे, अने आत्माना अनुभवथी ज प्रगटे छे.
(१०) सिद्धभगवंतोने परम उत्कृष्ट सुख छे, ते सुख शेनुं? के पोताना
आत्मस्वभावनुं.
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श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट वती प्रकाशक अने
मुद्रक: मगनलाल जैन, अजित मुद्रणालय: सोनगढ (प्रत: २६००)