: आसो : २४९६ आत्मधर्म : ३७ :
थईने मोक्ष सुधी तेनी अखंड आराधना करवी.–तेनो उपदेश भगवती आराधनामां
आप्यो छे.
हे जीव! तारे तारी आराधना अखंड करवी होय तो शुद्ध आत्मामां झंपलाव!
चारे आराधनानुं शरण पोतानो आत्मा छे; बहारमां बीजाना शरणे आराधना थती
नथी. जेणे पोताना आत्मानुं स्वरूप जाणीने तेनुं शरण लीधुं तेने सदाय आराधना ज
छे. समस्त श्रुतज्ञान छे ते आराधनानो ज विस्तार छे, एटले आराधना ते ज
सर्वश्रुतनो सार छे. आवी आराधना भगवंतोए आराधी तेथी तेने ‘भगवती’
कहेवामां आवी छे. [जय भगवती आराधना]
क्षणिक तादात्म्य अने
त्रिकाळ तादात्म्य
ईष्टोपदेश आशाधर–टीकामां कह्युं छे के सिद्धपर्यायनी
साथे आत्मा ‘कथंचित् तादात्म्य’ छे; त्रिकाळ तादात्म्य नथी
पण वर्तमान एक समयनुं तादात्म्य छे, माटे कथंचित्–
तादात्म्य कह्युं छे. जेम कथंचित् तादात्म्य कह्युं; तेम कथंचित्
भिन्न कह्युं. ते बंनेनी संधि छे. वीतरागी शास्त्रोमां बधा
कथन परस्पर मेळवाळां छे. रागादि विकार साथे तो
आत्माना ज्ञानस्वभावने एक समय पण तादात्म्यसिद्ध
संबंध नथी; निर्मळ पर्यायने आत्मा साथे एक समयनुं
तादात्म्यपणुं छे, ने ज्ञानादि स्वभावरूप गुणोने आत्मा साथे
त्रिकाळ तादात्म्यपणुं छे.–आवुं वस्तुस्वरूप दिगंबर सन्तो
सिवाय बीजा कोण समजावे? आवुं अंतरमां भेदज्ञान करवुं
ते ज सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान छे, आना विना मोक्षमार्ग
होतो नथी.