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मळ्या बराबर छे. अनादि काळथी जीव अंदरमां जतो नथी ने नवीनता प्राप्त करतो नथी; एक ने एक विषयनुं — शुभाशुभ भावनुं — पिष्टपेषण कर्या ज करे छे, थाकतो नथी. अशुभमांथी शुभमां ने वळी पाछो शुभमांथी अशुभमां जाय छे. जो शुभ भावथी मुक्ति थती होत, तो तो क्यारनी थई गई होत! हवे, जो पूर्वे अनंत वार करेला शुभ भावनो विश्वास छोडी, जीव अपूर्व नवीन भावने करे — जिनवरस्वामीए उपदेशेली शुद्ध सम्यक् परिणति करे, तो ते अवश्य शाश्वत सुखने पामे. ३६५.
जेणे आत्मा ओळख्यो छे, अनुभव्यो छे, तेने आत्मा ज सदा समीप वर्ते छे, दरेक पर्यायमां शुद्धात्मद्रव्य ज मुख्य रहे छे. विविध शुभ भावो आवे त्यारे कांई शुद्धात्मा भुलाई जतो नथी अने ते भावो मुख्यपणुं पामता नथी.
मुनिराजने पंचाचार, व्रत, नियम, जिनभक्ति इत्यादि सर्व शुभ भावो वखते भेदज्ञाननी धारा, स्वरूपनी शुद्ध चारित्रदशा निरंतर चालु ज होय छे. शुभ भावो नीचा ज रहे छे; आत्मा ऊंचो ने ऊंचो ज — ऊर्ध्व ज — रहे छे. बधुंय पाछळ रही जाय छे,