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बधां ताळांनी चावी एक — ‘ज्ञायकनो अभ्यास करवो’. आनाथी बधां ताळां खूली जशे. जेने संसारकारागृहमांथी छूटवुं होय, मुक्तिपुरीमां जवुं होय, तेणे मोहरागद्वेषरूप ताळां खोलवा माटे ज्ञायकनो अभ्यास करवारूप एक ज चावी लगाडवी. ३७३.
शुभ रागनी रुचि ते पण भवनी रुचि छे, मोक्षनी रुचि नथी. जे मंद कषायमां संतोषाय छे, ते अकषायस्वभाव ज्ञायकने जाणतो नथी तेम ज पामतो नथी. गुरुदेव पोकारी पोकारीने कहे छे के ज्ञायकनो आश्रय करी शुद्ध परिणति प्रगट कर; ते ज एक पद छे, बाकी बधुं अपद छे. ३७४.
आ चैतन्यतत्त्वने ओळखवुं. चैतन्यने ओळखवानो अभ्यास करवो, भेदज्ञाननो अभ्यास करवो — ए ज करवानुं छे. ए अभ्यास करतां करतां आत्मानी रागादिथी भिन्नता भासे तो आत्मानुं स्वरूप प्राप्त थाय. आत्मा चैतन्यतत्त्व छे, ज्ञायकस्वरूप छे — एने ओळखवो. जीवने एवो भ्रम छे के परद्रव्यनुं हुं करी शकुं छुं. पण पोते परपदार्थमां कांई करी शकतो नथी. दरेक द्रव्य स्वतंत्र छे. पोते जाणनारो छे, ज्ञायक छे.