परपदार्थमां एनुं ज्ञान जतुं नथी, परमांथी कांई आवतुं नथी. आ समजवा माटे देव-शास्त्र-गुरु आदि बाह्य निमित्तो होय छे, पण दर्शन-ज्ञान-चारित्र बधुं जे प्रगटे छे, ते पोतामांथी ज प्रगटे छे. ए मूळतत्त्वने ओळखवुं ते ज करवानुं छे. बीजुं बहारनुं तो अनंत काळमां घणुं कर्युं छे. शुभभावनी बधी क्रियाओ करी, शुभभावमां धर्म मान्यो, पण धर्म तो आत्माना शुद्धभावमां ज छे. शुभ तो विभाव छे, आकुळतारूप छे, दुःखरूप छे, एमां क्यांय शांति नथी. जोके शुभभाव आव्या विना रहेता नथी, तोपण त्यां शांति तो नथी ज. शांति होय, सुख होय — आनंद होय एवुं तत्त्व तो चैतन्य ज छे. निवृत्तिमय चैतन्यपरिणतिमां ज सुख छे, बहारमां क्यांय सुख छे ज नहि. माटे चैतन्यतत्त्वने ओळखीने तेमां ठरवानो प्रयास करवो ते ज खरुं श्रेयरूप छे. ते एक ज मनुष्यजीवनमां करवा-योग्य — हितरूप — कल्याणरूप छे. ३७५.
पूर्ण गुणोथी अभेद एवा पूर्ण आत्मद्रव्य उपर द्रष्टि करवाथी, तेना ज आलंबनथी, पूर्णता प्रगट थाय छे. आ अखंड द्रव्यनुं आलंबन ते ज अखंड एक परमपारिणामिकभावनुं आलंबन. ज्ञानीने ते आलंबनथी प्रगट थती औपशमिक, क्षायोपशमिक ने क्षायिकभावरूप