आवतां प्रबळ पुरुषार्थपूर्वक निजात्मद्रव्यने वळगे छे. ‘आवी पवित्र मुनिदशा क्यारे प्राप्त करीए!’ एवा मनोरथ सम्यग्द्रष्टिने वर्ते छे. ३७७.
जेने स्वभावनो महिमा जाग्यो छे एवा साचा आत्मार्थीने विषय-कषायोनो महिमा तूटीने तेमनी तुच्छता लागती होय छे. तेने चैतन्यस्वभावनी समजणमां निमित्तभूत देव-शास्त्र-गुरुनो महिमा आवे छे. गमे ते कार्य करतां तेने निरंतर शुद्ध स्वभावनी प्राप्ति करवानी खटक रह्या ज करे छे.
गृहस्थाश्रममां रहेला ज्ञानीने शुभाशुभ भावथी जुदा ज्ञायकने अवलंबनारी ज्ञातृत्वधारा निरंतर वर्त्या करे छे. परंतु पुरुषार्थनी नबळाईने लीधे अस्थिरतारूप विभावपरिणति ऊभी छे तेथी तेने गृहस्थाश्रमने लगता शुभाशुभ परिणाम होय छे. स्वरूपमां स्थिर रहेवातुं नथी तेथी ते विविध शुभभावोमां जोडाय छेः — ‘मने देव-गुरुनी सदा समीपता हो, गुरुनां चरणकमळनी सेवा हो’ इत्यादि प्रकारे जिनेंद्रभक्ति-स्तवन-पूजन अने गुरुसेवाना भावो होय छे तेम ज शास्त्रस्वाध्यायना, ध्यानना, दानना, भूमिकानुसार अणुव्रत तथा तप वगेरेना शुभभावो तेने हठ विना आवे छे. आ बधाय