Benshreena Vachanamrut-Gujarati (Devanagari transliteration).

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बहेनश्रीनां वचनामृत

भावो दरम्यान ज्ञातृत्वपरिणतिनी धारा तो सतत चालु ज होय छे.

निजस्वरूपधाममां रमनारा मुनिराजने पण पूर्ण वीतरागदशाना अभावे विधविध शुभभावो होय छेतेमने महाव्रत, अठ्यावीश मूळगुण, पंचाचार, स्वाध्याय, ध्यान इत्यादि संबंधी शुभ- भावो आवे छे तेम ज जिनेंद्रभक्ति-श्रुतभक्ति- गुरुभक्तिना उल्लासमय भावो पण आवे छे. ‘हे जिनेंद्र! आपनां दर्शन थतां, आपनां चरण- कमळनी प्राप्ति थतां, मने शुं न प्राप्त थयुं? अर्थात् आप मळतां मने बधुंय मळी गयुं.’ आम अनेक प्रकारे श्री पद्मनंदी आदि मुनिवरोए जिनेंद्रभक्तिना धोध वहाव्या छे.आवा आवा अनेक प्रकारना शुभभावो मुनिराजने पण हठ विना आवे छे. साथे साथे ज्ञायकना उग्र आलंबनथी मुनियोग्य उग्र ज्ञातृत्वधारा पण सतत चालु ज होय छे.

साधकनेमुनिने तेम ज सम्यग्द्रष्टि श्रावकनेजे शुभभावो आवे छे ते ज्ञातृत्वपरिणतिथी विरुद्ध- स्वभाववाळा होवाथी आकुळतारूपेदुःखरूपे वेदाय छे, हेयरूप जणाय छे, छतां ते भूमिकामां आव्या विना रहेता नथी.