Benshreena Vachanamrut-Gujarati (Devanagari transliteration).

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बहेनश्रीनां वचनामृत
१३९

साधकनी दशा एकसाथे त्रणपटी (त्रण विशेषतावाळी) छेएक तो, तेने ज्ञायकनो आश्रय अर्थात् शुद्धात्मद्रव्य प्रत्येनुं जोर निरंतर वर्ते छे जेमां अशुद्ध तेम ज शुद्ध पर्यायांशनी पण उपेक्षा होय छे; बीजुं, शुद्ध पर्यायांश सुखरूपे वेदाय छे; अने त्रीजुं, अशुद्ध पर्यायांशजेमां व्रत, तप, भक्ति आदि शुभभावो समाय छे तेदुःखरूपे, उपाधिरूपे वेदाय छे.

साधकने शुभभावो उपाधिरूप जणाय छेएनो अर्थ एवो नथी के ते भावो हठपूर्वक होय छे. आम तो साधकना ते भावो हठ विनानी सहजदशाना छे, अज्ञानीनी माफक ‘आ भावो नहि करुं तो परभवमां दुःखो सहन करवां पडशे’ एवा भयथी पराणे कष्टपूर्वक करवामां आवता नथी; छतां तेओ सुखरूप पण जणाता नथी. शुभभावोनी साथे साथे वर्तती, ज्ञायकने अवलंबनारी जे यथोचित निर्मळ परिणति ते ज साधकने सुखरूप जणाय छे.

जेम हाथीने बहारना दांतदेखावना दांत जुदा होय छे अने अंदरना दांतचाववाना दांत जुदा होय छे, तेम साधकने बहारमां उत्साहनां कार्यशुभ परिणाम देखाय ते जुदा होय छे अने अंतरमां आत्मशान्तिनुंआत्मतृप्तिनुं स्वाभाविक परिणमन जुदुं