साधकनी दशा एकसाथे त्रणपटी ( – त्रण विशेषतावाळी) छेः — एक तो, तेने ज्ञायकनो आश्रय अर्थात् शुद्धात्मद्रव्य प्रत्येनुं जोर निरंतर वर्ते छे जेमां अशुद्ध तेम ज शुद्ध पर्यायांशनी पण उपेक्षा होय छे; बीजुं, शुद्ध पर्यायांश सुखरूपे वेदाय छे; अने त्रीजुं, अशुद्ध पर्यायांश — जेमां व्रत, तप, भक्ति आदि शुभभावो समाय छे ते — दुःखरूपे, उपाधिरूपे वेदाय छे.
साधकने शुभभावो उपाधिरूप जणाय छे — एनो अर्थ एवो नथी के ते भावो हठपूर्वक होय छे. आम तो साधकना ते भावो हठ विनानी सहजदशाना छे, अज्ञानीनी माफक ‘आ भावो नहि करुं तो परभवमां दुःखो सहन करवां पडशे’ एवा भयथी पराणे कष्टपूर्वक करवामां आवता नथी; छतां तेओ सुखरूप पण जणाता नथी. शुभभावोनी साथे साथे वर्तती, ज्ञायकने अवलंबनारी जे यथोचित निर्मळ परिणति ते ज साधकने सुखरूप जणाय छे.
जेम हाथीने बहारना दांत — देखावना दांत जुदा होय छे अने अंदरना दांत — चाववाना दांत जुदा होय छे, तेम साधकने बहारमां उत्साहनां कार्य — शुभ परिणाम देखाय ते जुदा होय छे अने अंतरमां आत्मशान्तिनुं — आत्मतृप्तिनुं स्वाभाविक परिणमन जुदुं