Benshreena Vachanamrut-Gujarati (Devanagari transliteration). Bol: 389.

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बहेनश्रीनां वचनामृत
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के ‘मारी स्वरूपस्थिरतानो अखतरो करवानो मने मोको मळ्यो माटे उपसर्ग मारो मित्र छे’. अंतरंग मुनिदशा अद्भुत छे; देहमां पण उपशमरसना ढाळा ढळी गया होय छे. ३८८.

द्रव्यद्रष्टि यथार्थ प्रगट थाय छे, तेने द्रष्टिना जोरमां एकलो ज्ञायक जचैतन्य ज भासे छे, शरीरादि कांई भासतुं नथी. भेदज्ञाननी परिणति एवी द्रढ थई जाय छे के स्वप्नमां पण आत्मा शरीरथी जुदो भासे छे. दिवसे जागतां तो ज्ञायक निराळो रहे पण रात्रे ऊंघमां पण आत्मा निराळो ज रहे छे. निराळो तो छे ज पण प्रगट निराळो थई जाय छे.

तेने भूमिका प्रमाणे बाह्य वर्तन होय छे पण गमे ते संयोगमां तेनी ज्ञान-वैराग्यशक्ति कोई जुदी ज रहे छे. हुं तो ज्ञायक ते ज्ञायक ज छुं, निःशंक ज्ञायक छुं; विभाव ने हुं कदी एक नथी थया; ज्ञायक छूटो ज छे, आखुं ब्रह्मांड फरे तोपण छूटो ज छे.आवो अचळ निर्णय होय छे. स्वरूप-अनुभवमां अत्यंत निःशंकता वर्ते छे. ज्ञायक ऊंचे चडीनेऊर्ध्वपणे बिराजे छे, बीजुं बधुं नीचे रही गयुं होय छे. ३८९.