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मुनिराज समाधिपरिणत छे. ज्ञायकने अवलंबी विशेष विशेष समाधिसुख प्रगटाववाने तेओ उत्सुक छे. मुनिवर श्री पद्मप्रभमलधारिदेव कहे छे के मुनि ‘सकळविमळ केवळज्ञानदर्शनना लोलुप’ छे. ‘क्यारे स्वरूपमां एवी जमवट थाय के श्रेणी ऊपडीने वीतरागदशा प्रगटे? क्यारे एवो अवसर आवे के स्वरूपमां उग्र रमणता जामे अने आत्मानुं परिपूर्ण स्वभावज्ञान — केवळज्ञान प्रगट थाय? क्यारे एवुं परम ध्यान जामे के आत्मा शाश्वतपणे आत्मस्वभावमां ज रही जाय?’ आवी मुनिराजने भावना वर्ते छे. आत्माना आश्रये एकाग्रता करतां करतां तेओ केवळज्ञाननी समीप जई रह्या छे. घणी शान्ति वेदाय छे. कषायो घणा मंद पडी गया छे. कदाचित् कांईक ॠद्धि — चमत्कार पण प्रगटतां जाय छे; पण तेमनुं ते प्रत्ये दुर्लक्ष छे. ‘अमारे आ चमत्कार नथी जोईता. अमारे तो पूर्ण चैतन्यचमत्कार जोईए छे. तेना साधनरूपे, एवुं ध्यान — एवी निर्विकल्पता — एवी समाधि जोईए छे के जेना परिणामे असंख्य प्रदेशे दरेक गुण तेनी परिपूर्ण पर्याये प्रगट थाय, चैतन्यनो पूर्ण विलास प्रगटे.’
— आ भावनाने आत्मामां अत्यंत लीनता वडे मुनिराज सफळ करे छे. ३९०.