अज्ञानीए अनादि काळथी अनंत ज्ञान-आनंदादि समृद्धिथी भरेला निज चैतन्यमहेलने ताळां मारी दीधां छे अने पोते बहार रखड्या करे छे. ज्ञान बहारथी शोधे छे, आनंद बहारथी शोधे छे, बधुं बहारथी शोधे छे. पोते भगवान होवा छतां भिक्षा माग्या करे छे.
ज्ञानीए चैतन्यमहेलनां ताळां खोली नाख्यां छे. अंदरमां ज्ञान-आनंद आदिनी अखूट समृद्धि देखीने, अने थोडी भोगवीने, तेने पूर्वे कदी नहोती अनुभवी एवी निरांत थई गई छे. ३९१.
एक चैतन्यतत्त्व ज उत्कृष्ट आश्चर्यकारी छे. विश्वमां कोई एवी विभूति नथी के जे चैतन्यतत्त्वथी ऊंची होय. ते चैतन्य तो तारी पासे ज छे, तुं ज ते छो. तो पछी शरीर उपर उपसर्ग आवतां के शरीर छूटवाना प्रसंगमां तुं डरे छे केम? जे कोई बाधा पहोंचाडे छे ते तो पुद्गलने पहोंचाडे छे, जे छूटी जाय छे ते तो तारुं हतुं ज नहि. तारुं तो मंगळकारी, आश्चर्यकारी तत्त्व छे. तो पछी तने डर शानो? समाधिमां स्थिर थईने एक आत्मानुं ध्यान कर, भय छोडी दे. ३९२.