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तरफ ढळी रह्युं छे. ज्ञानी निज स्वरूपमां परिपूर्णपणे ठरी जवा तलसे छे. ‘आ विभावभाव अमारो देश नथी. आ परदेशमां अमे क्यां आवी चड्या? अमने अहीं गोठतुं नथी. अहीं अमारुं कोई नथी. ज्यां ज्ञान, श्रद्धा, चारित्र, आनंद, वीर्यादि अनंतगुणरूप अमारो परिवार वसे छे ते अमारो स्वदेश छे. अमे हवे ते स्वरूपस्वदेश तरफ जई रह्या छीए. अमारे त्वराथी अमारा मूळ वतनमां जईने निरांते वसवुं छे ज्यां बधां अमारां छे.’ ४०१.
जे केवळज्ञानने प्राप्त करावे एवुं छेल्ली पराकाष्ठानुं ध्यान ते उत्तम प्रतिक्रमण छे. आ महा मुनिराजे एवुं प्रतिक्रमण कर्युं के दोष फरीने कदी उत्पन्न ज न थया; छेक श्रेणि मांडी दीधी के जेना परिणामे वीतरागता थईने केवळज्ञाननो आखो सागर ऊछळ्यो! अंतर्मुखता तो घणी वार थई हती, पण आ अंतर्मुखता तो छेल्लामां छेल्ली कोटिनी! आत्मा साथे पर्याय एवी जोडाई गई के उपयोग अंदर गयो ते गयो ज, पाछो कदी बहार ज न आव्यो. जेवो चैतन्यपदार्थने ज्ञानमां जाण्यो हतो तेवो ज तेने पर्यायमां प्रसिद्ध करी लीधो. ४०२.