Benshreena Vachanamrut-Gujarati (Devanagari transliteration). Bol: 403-405.

< Previous Page   Next Page >


Page 153 of 186
PDF/HTML Page 170 of 203

 

बहेनश्रीनां वचनामृत
१५३

जेम पूनमना पूर्ण चंद्रना योगे समुद्रमां भरती आवे छे, तेम मुनिराजने पूर्ण चैतन्यचंद्रना एकाग्र अवलोकनथी आत्मसमुद्रमां भरती आवे छे;वैराग्यनी भरती आवे छे, आनंदनी भरती आवे छे, सर्व गुणपर्यायनी यथासंभव भरती आवे छे. आ भरती बहारथी नहि, भीतरथी आवे छे. पूर्ण चैतन्यचंद्रने स्थिरतापूर्वक निहाळतां अंदरथी चेतना ऊछळे छे, चारित्र ऊछळे छे, सुख ऊछळे छे, वीर्य ऊछळे छे बधुं ऊछळे छे. धन्य मुनिदशा! ४०३.

परथी भिन्न ज्ञायकस्वभावनो निर्णय करी, वारंवार भेदज्ञाननो अभ्यास करतां करतां मतिश्रुतना विकल्पो तूटी जाय छे, उपयोग ऊंडाणमां चाल्यो जाय छे अने भोंयरामां भगवाननां दर्शन प्राप्त थाय तेम ऊंडाणमां आत्मभगवान दर्शन दे छे. आम स्वानुभूतिनी कळा हाथमां आवतां, कई रीते पूर्णता पमाय ते बधी कळा हाथमां आवी जाय छे, केवळज्ञान साथे केलि शरू थाय छे. ४०४.

अज्ञानी जीव ‘आ बधुं क्षणिक छे, संसारनी उपाधि दुःखरूप छे’ एवा भावथी वैराग्य करे छे, पण ‘मारो