छे ते बधाने पण पूरुं जाणे छे. ज्ञानशक्ति अद्भुत छे. ४१३.
कोई पोते चक्रवर्ती राजा होवा छतां, पोतानी पासे ॠद्धिना भंडार भर्या होवा छतां, बहार भीख मागे, तेम तुं पोते त्रण लोकनो नाथ होवा छतां, तारी पासे अनंत गुणरूप ॠद्धिना भंडार भर्या होवा छतां, ‘पर पदार्थ मने कंईक ज्ञान देजो. मने सुख देजो’ एम भीख माग्या करे छे! ‘मने धनमांथी सुख मळजो, मने शरीरमांथी सुख मळजो, मने शुभ कार्योमांथी सुख मळजो, मने शुभ परिणाममांथी सुख मळजो’ एम तुं भीख माग्या करे छे! पण बहारथी कंई मळतुं नथी. ऊंडाणथी ज्ञायकपणानो अभ्यास करवामां आवे तो अंदरथी ज बधुं मळे छे. जेम भोंयरामां जई योग्य चावी वडे पटारानुं ताळुं खोलवामां आवे तो निधान मळे अने दारिद्र फीटे, तेम ऊंडाणमां जई ज्ञायकना अभ्यासरूप चावीथी भ्रांतिरूप ताळुं खोली नाखवामां आवे तो अनंत गुणरूप निधान प्राप्त थाय अने मागणवृत्ति मटे. ४१४.