पछी जेना गर्भमां तेनाथी अनंतानंतगुणां दुःख पड्यां छे एवा मिथ्यात्वने छोडवानो उद्यम तुं केम करतो नथी? गफलतमां केम रहे छे? आवो उत्तम योग फरीने क्यारे मळशे? तुं मिथ्यात्व छोडवाने मरणियो प्रयत्न कर, एटले के शाता – अशाताथी भिन्न तेम ज आकुळतामय शुभाशुभ भावोथी पण भिन्न एवा निराकुळ ज्ञायकस्वभावने अनुभववानो प्रबळ पुरुषार्थ कर. ए ज आ भवमां करवा जेवुं छे. ४१६.
सम्यग्दर्शन थया पछी आत्मस्थिरता वधतां वधतां, वारंवार स्वरूपलीनता थया करे एवी दशा थाय त्यारे मुनिपणुं आवे छे. मुनिने स्वरूप तरफ ढळती शुद्धि एवी वधी गई होय छे के तेओ घडीए घडीए आत्मानी अंदरमां प्रवेशी जाय छे. पूर्ण वीतरागताना अभावने लीधे ज्यारे बहार आवे छे त्यारे विकल्पो तो ऊठे छे पण ते गृहस्थदशाने योग्य होता नथी, मात्र स्वाध्याय-ध्यान-व्रत-संयम-तप-भक्ति इत्यादिसंबंधी मुनियोग्य शुभ विकल्पो ज होय छे अने ते पण हठ रहित होय छे. मुनिराजने बहारनुं कांई जोईतुं नथी. बहारमां एक शरीरमात्रनो संबंध छे, तेना प्रत्ये पण परम उपेक्षा छे. घणी निःस्पृह दशा छे. आत्मानी ज