उग्र पुरुषार्थ वारंवार करे, ज्ञायकनो ज अभ्यास, ज्ञायकनुं ज मंथन, तेनुं ज चिंतवन करे, तो प्रगट थाय.
पूज्य गुरुदेवे मार्ग बताव्यो छे; चारे पडखेथी स्पष्ट कर्युं छे. ४२७.
प्रश्नः — आत्मानी विभूतिने उपमा आपी समजावो.
उत्तरः — चैतन्यतत्त्वमां विभूति भरी छे. कोई उपमा तेने लागु पडती नथी. चैतन्यमां जे विभूति भरी छे ते अनुभवमां आवे छे; उपमा शी अपाय? ४२८.
प्रश्नः — प्रथम आत्मानुभव थतां पहेलां, छेल्लो विकल्प केवो होय?
उत्तरः — छेल्ला विकल्पनो कोई नियम नथी. भेद- ज्ञानपूर्वक शुद्धात्मतत्त्वनी सन्मुखतानो अभ्यास करतां करतां चैतन्यतत्त्वनी प्राप्ति थाय छे. ज्यां ज्ञायक तरफ परिणति ढळी रही होय छे, त्यां क्यो विकल्प छेल्लो होय (अर्थात् छेल्ले अमुक ज विकल्प होय) एवो ‘विकल्प’संबंधी कोई नियम नथी. ज्ञायकधारानी उग्रता- तीक्ष्णता थाय त्यां ‘विकल्प क्यो?’ तेनो संबंध नथी.