१७२
भेदज्ञाननी उग्रता, तेनी लगनी, तेनी ज तीव्रता होय; शब्दथी वर्णन न थई शके. अभ्यास करे, ऊंडाणमां जाय, तेना तळमां जईने ओळखे, तळमां जईने ठरे, तो प्राप्त थाय — ज्ञायक प्रगट थाय. ४२९.
प्रश्नः — निर्विकल्प दशा थतां वेदन शानुं होय? द्रव्यनुं के पर्यायनुं?
उत्तरः — द्रष्टि तो ध्रुवस्वभावनी ज होय छे; वेदाय छे आनंदादि पर्याय.
स्वभावे द्रव्य तो अनादि-अनंत छे जे फरतुं नथी, बदलतुं नथी. तेना उपर द्रष्टि करवाथी, तेनुं ध्यान करवाथी, पोतानी विभूतिनो प्रगट अनुभव थाय छे. ४३०.
प्रश्नः — निर्विकल्प अनुभूति वखते आनंद केवो थाय?
उत्तरः — ते आनंदनो, कोई जगतना — विभावना — आनंद साथे, बहारनी कोई वस्तु साथे, मेळ नथी. जेने अनुभवमां आवे छे ते जाणे छे. तेने कोई उपमा लागु पडती नथी. एवो अचिंत्य