Benshreena Vachanamrut-Gujarati (Devanagari transliteration). Bol: 430-431.

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बहेनश्रीनां वचनामृत

भेदज्ञाननी उग्रता, तेनी लगनी, तेनी ज तीव्रता होय; शब्दथी वर्णन न थई शके. अभ्यास करे, ऊंडाणमां जाय, तेना तळमां जईने ओळखे, तळमां जईने ठरे, तो प्राप्त थायज्ञायक प्रगट थाय. ४२९.

प्रश्ननिर्विकल्प दशा थतां वेदन शानुं होय? द्रव्यनुं के पर्यायनुं?

उत्तरद्रष्टि तो ध्रुवस्वभावनी ज होय छे; वेदाय छे आनंदादि पर्याय.

स्वभावे द्रव्य तो अनादि-अनंत छे जे फरतुं नथी, बदलतुं नथी. तेना उपर द्रष्टि करवाथी, तेनुं ध्यान करवाथी, पोतानी विभूतिनो प्रगट अनुभव थाय छे. ४३०.

प्रश्ननिर्विकल्प अनुभूति वखते आनंद केवो थाय?

उत्तरते आनंदनो, कोई जगतनाविभावना आनंद साथे, बहारनी कोई वस्तु साथे, मेळ नथी. जेने अनुभवमां आवे छे ते जाणे छे. तेने कोई उपमा लागु पडती नथी. एवो अचिंत्य