Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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तेथी, सातमी पृथ्वीमां चारे दिशाओमां एक एक बिल रहे छे.
रत्नप्रभा आदि पृथ्वीओना नारकीना शरीरनी ऊंचाईनुं कथन करवामां आवे छे.
प्रथम पटलमां त्रण हाथनी ऊंचाई छे, पछी क्रमे क्रमे वधता वधता तेरमा पटलमां सात
धनुष्य, त्रण हाथ अने छ आंगळनी ऊंचाई छे. पछी बीजी पृथ्वी आदिना अंतिम इन्द्रक
बिलोमां बमणी बमणी करवाथी सातमी पृथ्वीमां पांचसो धनुष्यनी ऊंचाई थाय छे.
उपरना नरकोमां जे उत्कृष्ट ऊंचाई छे तेनाथी कांईक अधिक नीचेना नरकोमां जघन्य
ऊंचाई छे, तेवी ज रीते पटलोमां पण जाणवुं. नारकी जीवोना आयुष्यनुं प्रमाण कहे
छे. प्रथम पृथ्वीना प्रथम पटलमां जघन्य दस हजार वर्षनुं आयुष्य छे, त्यारपछी
आगममां कहेली क्रमिक वृद्धि प्रमाणे छेल्ला पटलमां एक सागरप्रमाण उत्कृष्ट आयुष्य
छे. त्यारपछी बीजी वगेरे पृथ्वीओमां क्रमपूर्वक त्रण सागर, सात सागर, दस सागर,
सत्तर सागर, बावीस सागर अने तेत्रीस सागरप्रमाण उत्कृष्ट आयुष्यप्रमाण छे. पहेली
पृथ्वीमां जे उत्कृष्ट आयुष्य छे तेनाथी एक समय अधिक बीजीमां जघन्य आयुष्य छे.
तेवी ज रीते पहेला पटलमां जे उत्कृष्ट आयुष्य छे तेनाथी एक समय अधिक बीजा
पटलमां जघन्य आयुष्य छे. आ प्रमाणे सातमी पृथ्वी सुधी जाणवुं. स्वशुद्धात्मना
संवेदनरूप निश्चयरत्नत्रयथी विलक्षण तीव्र मिथ्यादर्शन
ज्ञान
चारित्ररूपे परिणमेल असंज्ञी
पंचेन्द्रिय, घो वगेरे, पक्षी, सर्प, सिंह अने स्त्रीओने क्रमपूर्वक रत्नप्रभा आदि छ पृथ्वीओ
सुधी जवानी शक्ति छे. सातमी पृथ्वीमां कर्मभूमिमां उत्पन्न थयेल मनुष्य अने मत्स्योने
चतुर्दिग्भागेष्वेकं बिलं तिष्ठति
रत्नप्रभादिनारकदेहोत्सेधः कथ्यते प्रथमपटले हस्तत्रयं ततः क्रमवृद्धि-
वशात्त्रयोदशपटले सप्तचापानि हस्तत्रयमङ्गुलषट्कं ततो द्वितीयपृथिव्यादिषु चरमेन्द्रकेषु
द्विगुणद्विगुणे क्रियमाणे सप्तमपृथिव्यां चापशतपञ्चकं भवति उपरितने नरके य उत्कृष्टोत्सेधः
सोऽधस्तने नरके विशेषाधिको जघन्यो भवति, तथैव पटलेषु च ज्ञातव्यः आयुः प्रमाणं
कथ्यते प्रथमपृथिव्यां प्रथमे पटले जघन्येन दशवर्षसहस्राणि तत आगमोक्त-
क्रमवृद्धिवशादन्तपटले सर्वोत्कर्षेणैकसागरोपमम् ततः परं द्वितीयपृथिव्यादिपु क्रमेण
त्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपममुत्कृष्टजीवितम् यच्च प्रथमपृथिव्यामुत्कृष्टं
तद्द्वितीयायां समयाधिकं जघन्यं, तथैव पटलेषु च एवं सप्तमपृथिवीपर्यन्तं ज्ञातव्यम्
स्वशुद्धात्मसंवित्तिलक्षणनिश्चयरत्नत्रयविलक्षणैस्तीव्रमिथ्यात्वदर्शनज्ञानचारित्रैः परिणतानाम-
संज्ञिपञ्चेन्द्रियसरटपक्षिसर्पसिंहस्त्रीणां क्रमेण रत्नप्रभादिषु षट्पृथिवीषु गमनशक्तिरस्ति
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १३३