Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कथन करे छे. पूर्वे कहेली जे भूतारण्यवनवेदिका छे तेनी पूर्वे क्षेत्र छे, त्यार पछी वक्षार
पर्वत छे, त्यार पछी क्षेत्र छे, पछी विभंगा नदी छे, पछी क्षेत्र छे, पछी वक्षार पर्वत
छे, पछी क्षेत्र छे, पछी विभंगा नदी छे, पछी क्षेत्र छे, पछी वक्षार पर्वत छे, पछी क्षेत्र
छे, पछी विभंगा नदी छे, पछी क्षेत्र छे, पछी वक्षार पर्वत छे, पछी क्षेत्र छे, त्यार पछी
मेरुपर्वतनी पश्चिम दिशामां पश्चिम भद्रशाल वननी वेदिका छे. आवी रीते नव भींतोनी
वच्चे आठ क्षेत्रो छे. तेमनां क्रमथी नाम कहे छे
वप्रा, सुवप्रा, महावप्रा, वप्रकावती, गंधा,
सुगंधा, गंधिला, गंधमालिनी. तेनी मध्यमां स्थित नगरीओनां नाम कहेवाय छेविजया,
वैजयंती, जयंती, अपराजिता, चक्रपुरी, खड्गपुरी, अयोध्या अने अवध्या.
हवे, जेम भरतक्षेत्रमां गंगा अने सिंधु ए बे नदीओथी तथा विजयार्ध पर्वतथी
पांच म्लेच्छ खंड अने एक आर्यखंड एम छ खंड थया, तेम पूर्वोक्त बत्रीस विदेहक्षेत्रोमां
गंगा अने सिंधु जेवी बे नदीओ अने विजयार्ध पर्वतथी प्रत्येक क्षेत्रना छ खंड जाणवा.
विशेष ए छे के; आ बधां क्षेत्रोमां सदाय चोथा काळनी आदि जेवो काळ रहे छे. त्यां
उत्कृष्ट आयुष्य करोड पूर्वनुं छे अने शरीरनी ऊंचाई पांचसो धनुष्यनी छे. पूर्वनुं माप
कहे छे. ‘‘पूर्वनुं प्रमाण सित्तेर लाख, छप्पन हजार करोड वर्ष जाणवुं.’’
तेषां विभागभेदं कथयति पूर्वभणिता या भूतारण्यवनवेदिका तस्याः पूर्वभागे क्षेत्रं भवति
तदनंतरं वक्षारपर्वतस्तदनंतरं क्षेत्रं, ततो विभंगा नदी, ततः क्षेत्रं, ततो वक्षारपर्वतः, ततश्च
क्षेत्रं, ततश्च विभंगा नदी, ततोऽपि क्षेत्रं, ततो वक्षारपर्वतस्ततः क्षेत्रं, ततो विभंगा नदी,
ततः क्षेत्रं, ततश्च वक्षारपर्वतस्ततः क्षेत्रं, ततो मेरुदिशाभागे पश्चिमभद्रशालवनवेदिका चेति
नवभित्तिषुं मध्येऽष्टौ क्षेत्राणि भवन्ति
तेषां क्रमेण नामानि कथ्यन्तेवप्रा १, सुवप्रा २,
महावप्रा ३, वप्रकावती ४, गन्धा ५, सुगन्धा ६, गन्धिला ७, गन्धमालिनी ८ चेति
तन्मध्यस्थितनगरीणां नामानि कथ्यन्तेविजया १, वैजयंती २, जयंती ३, अपराजिता
४, चक्रपुरी ५, खड्गपुरी ६, अयोध्या ७, अवध्या ८ चेति
अथ यथाभरतक्षेत्रेगङ्गासिंधुनदीद्वयेन विजयार्धपर्वतेन च म्लेच्छखण्डपञ्चकमार्यखण्डं
चेति षट् खण्डानि जातानि तथैव तेषु द्वात्रिंशत्क्षेत्रेषु गङ्गासिंधुसमाननदीद्वयेन विजयार्धपर्वतेन
च प्रत्येकं षट् खण्डानि ज्ञातव्यानि अयं तु विशेषः एतेषु क्षेत्रेषु सर्वदैव
चतुर्थकालादिसमानकालः उत्कर्षेणं पूर्वकोटिजीवितं, पञ्चशतचापोत्सेधश्चेति विज्ञेयम्
पूर्वप्रमाणं कथ्यते ‘‘पुव्वस्स हु परिमाणं सदरिं खलु सदसहस्सकोडीओ छष्पण्णं च सहस्सा
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बृहद्द्रव्यसंग्रह