Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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करवामां आवे छे. ते आ प्रमाणेजंबूद्वीपनी अंदर एकसो एंसी योजन अने बहारमां
अर्थात् लवण समुद्रमां त्रणसो त्रीस योजन, एम कुल पांचसो दस योजन प्रमाण गमन
क्षेत्र कहेवाय छे, ते चंद्र अने सूर्य बंनेनुं एक ज गमनक्षेत्र छे. तेमां भरतक्षेत्र अने
बहारना भागना गमन
क्षेत्रमां सूर्यना मार्ग एकसो चोरासी छे अने चंद्रना मार्ग पंदर
ज छे. तेमां जंबूद्वीपमां कर्कट संक्रान्तिना दिवसे, दक्षिणायनना प्रारंभमां, निषध पर्वत उपर
प्रथम मार्गमां सूर्यनो प्रथम उदय थाय छे. त्यां सूर्य विमानमां स्थित निर्दोष परमात्म
जिनेश्वरना अकृत्रिम बिंबने प्रत्यक्ष जोईने, अयोध्या नगरीमां स्थित भरत चक्रवर्ती निर्मळ
सम्यक्त्वना अनुरागथी पुष्पांजलि आपीने अर्ध्य आपे छे. ते मार्गमां स्थित भरतक्षेत्रना
सूर्यनुं ऐरावतक्षेत्रना सूर्य साथे अने भरतक्षेत्रना चंद्रनुं ऐरावतक्षेत्रना चंद्र साथे जे अंतर
रहे छे, ते विशेषपणे आगममांथी जाणी लेवुं.
हवे ‘‘शतभिषा, भरणी, आर्द्रा, स्वाति, अश्लेषा अने ज्येष्ठाए छ नक्षत्र
जघन्य छे; रोहिणी, विशाखा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा अने उत्तराभाद्रपद
ए छ नक्षत्र उत्तम छे अने बाकीनां नक्षत्रो मध्यम छे.’’ ए प्रमाणे गाथामां कहेला क्रम
अनुसार जे जघन्य, उत्कृष्ट अने मध्यम नक्षत्र छे, तेमांथी क्या नक्षत्रमां केटला दिवस
सूर्य रहे छे ते कहे छे. ‘‘एक
मुहूर्तमां चंद्र १७६८, सूर्य १८३० अने नक्षत्र १८३५
योजनानामशीतिशतं बहिर्भागे लवणसमुद्रसम्बन्धे त्रिंशदधिकशतत्रयमिति समुदायेन
दशोत्तरयोजनशतपञ्चकं चारक्षेत्रं भण्यते, तत् चन्द्रादित्ययोरेकमेव
तत्र भरतेन (सह)
बहिर्भागे तस्मिंश्चारक्षेत्रे सूर्यस्य चतुरशीतिशतसंख्या मार्गा भवन्ति, चन्द्रस्य पञ्चदशैव तत्र
जम्बूद्वीपाभ्यन्तरे कर्कटसंक्रान्तिदिने दक्षिणायनप्रारम्भे निषधपर्वतस्योपरि प्रथममार्गे सूर्यः
प्रथमोदयं करोति
यत्र सूर्यविमानस्थं निर्दोषपरमात्मनो जिनेश्वरस्याकृत्रिमं जिनबिम्बम्
प्रत्यक्षेण दृष्ट्वा अयोध्यानगरीस्थितो निर्मलसम्यक्त्वानुरागेण भरतचक्री पुष्पाञ्जलिमुत्क्षिप्यार्घ्यं
ददातीति
तन्मार्गस्थितभरतक्षेत्रादित्यस्यैरावतादित्येन सह तथापि चन्द्रस्यान्यचन्द्रेण सह
यदन्तरं भवति तद्विशेषेणागमतो ज्ञातव्यम्
अथ ‘‘सदभिस भरणी अद्दा सादी असलेस्स जेट्ठमवर वरा रोहिणि विसाह पुणव्वसु
तिउत्तरा मज्झिमा सेसा ’’ इति गाथाकथितक्रमेण यानि जघन्योत्कृष्टमध्यमनक्षत्राणि तेषु
मध्ये कस्मिन्नक्षत्रे कियन्ति दिनान्यादित्यस्तिष्ठतीति ‘‘इंदु रवीदो रिक्खा सत्तठ्ठि पंच
गगणखंडहिया अहियहिदरिक्खखंडा रिक्खे इंदुरवीअत्थणमुहुत्ता ’’ इत्यनेन
१. त्रिलोकसार गाथा ३९९.
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