Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 155 of 272
PDF/HTML Page 167 of 284

 

background image
माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांतव, कापिष्ट, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्रार, आनत, प्राणत,
आरण अने अच्युत नामनां सोळ स्वर्ग छे. त्यांथी आगळ नव ग्रैवेयक विमान छे, त्यांथी
उपर नव अनुदिश नामनां नव विमानोनुं एक पटल छे, तेनाथी पण उपर पांच अनुत्तर
नामनां पांच विमानोनुं एक पटल छे. ए रीते उक्त क्रमे उपर उपर वैमानिक देवो रहे
छे. आ वार्तिक अर्थात् संग्रहवाक्य अथवा समुदाय-कथन छे. आदिमां बार, मध्यमां आठ
अने अंते चार योजन प्रमाण गोळ व्यासवाळी, चाळीस योजन ऊंची जे मेरु पर्वतनी
चूलिका छे तेनी उपर देवकुरु अथवा उत्तरकुरु नामनी उत्तम भोगभूमिना मनुष्यना वाळना
अग्रभाग जेटले अंतरे ॠजु विमान छे. चूलिका सहित मेरु पर्वतनी ऊंचाईनुं प्रमाण
एक लाख योजन छे. ते (ऊंचाई)नाथी शरू करीने दोढ राजु प्रमाण जे आकाशक्षेत्र छे
त्यां सुधी सौधर्म अने इशान नामनां बे स्वर्ग छे. तेना उपर दोढ राजु सुधी सानत्कुमार
अने माहेन्द्र नामनां बे स्वर्ग छे, त्यांथी अर्धा राजु सुधी ब्रह्म अने ब्रह्मोत्तर नामनां
बे स्वर्ग छे, त्यांथी पण अर्धा राजु सुधी लांतव अने कापिष्ट नामनां बे स्वर्ग छे. त्यांथी
उपर अर्धा राजु सुधी शुक्र अने महाशुक्र नामनां बे स्वर्ग जाणवां. त्यारपछी अर्धा राजु
सुधी शतार अने सहस्रार नामनां बे स्वर्ग छे, त्यारपछी आगळ अर्धा राजु सुधी आनत
अने प्राणत नामनां बे स्वर्ग छे, त्यारपछी अर्धा राजु सुधी आकाशमां आरण अने
अच्युत नामनां बे स्वर्ग छे. त्यां प्रथमनां बे युगलोमां पोतपोतानां स्वर्गनां नामवाळा
लान्तवकापिष्टशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारानतप्राणतारणाच्युतसंज्ञाः षोडश स्वर्गाः ततोऽपि
नवग्रैवेयकसंज्ञास्ततश्च नवानुदिशसंज्ञं नवविमानसंख्यमेकपटलं ततोऽपि पंचानुत्तरसंज्ञं
पंचविमानसंख्यमेकपटलं चेत्युक्तक्रमेणोपर्युपरि वैमानिकदेवास्तिष्ठन्तीति वार्त्तिकं सङ्ग्रहवाक्यं
समुदायकथनमिति यावत्
आदिमध्यान्तेषु द्वादशाष्टचतुर्योजनवृत्तविष्कम्भा
चत्वारिंशत्प्रमितयोजनोत्सेधा या मेरुचूलिका तिष्ठति तस्या उपरि कुरुभूमिजमर्त्यवालाग्रान्तरितं
पुनऋर्ृजुविमानमस्ति
तदादिं कृत्वा चूलिकासहितलक्षयोजनप्रमाणं मेरूत्सेधमान-
मर्द्धाधिकैकरज्जूप्रमाणं यदाकाशक्षेत्रं तत्पर्यन्तं सौधर्मैज्ञानसंज्ञं स्वर्गयुगलं तिष्ठति ततः
परमर्द्धाधिकैकरज्जुपर्यन्तं सानत्कुमारमाहेन्द्रसंज्ञं स्वर्गयुगलं भवति, तस्मादर्द्धरज्जुप्रमाणाकाश-
पर्यन्तं ब्रह्मब्रह्मोत्तराभिधानं स्वर्गयुगलमस्ति, ततोऽप्यर्द्धरज्जुपर्यन्तं लांतवकापिष्टनामस्वर्ग-
युगलमस्ति, ततश्चार्द्धरज्जुपर्यन्तं शुक्रमहाशुक्राभिधानं स्वर्गद्वयं ज्ञातव्यम्, तदनंतरमर्द्धरज्जुपर्यन्तं
शतारसहस्रारसंज्ञं स्वर्गयुगलं भवति, ततोऽप्यर्द्धरज्जुपर्यन्तमानतप्राणतनाम स्वर्गयुगलं, ततः
परमर्द्धरज्जुपर्यन्तमाकाशं यावदारणाच्युताभिधानं स्वर्गद्वयं ज्ञातव्यमिति
तत्र प्रथमयुगलद्वये
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १५५