Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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अनुत्तर पटलमां तेत्रीस सागरना उत्कृष्ट आयुष्यनुं प्रमाण जाणवुं.
सौधर्म आदि स्वर्गमां जे उत्कृष्ट आयुष्य छे ते आयुष्य सर्वार्थसिद्धि सिवाय उपर
उपरना स्वर्गमां जघन्य आयुष्य छे. बाकीनुं विशेष व्याख्यान त्रिलोकसार आदिमांथी
जाणवुं.
विशेषआदिमध्यअंतरहित, शुद्धबुद्ध एकस्वभाव परमात्मामां सकल
निर्मल केवळज्ञानरूप नेत्र वडे अरीसामां प्रतिबिंबोनी पेठे, शुद्धात्मा आदि पदार्थो
आलोकित थाय छे
देखाय छेजणाय छेपरिच्छिन्न थाय छे; तेथी ते कारणे ते ज
(शुद्धात्मा ज) निश्चयलोक छे अथवा ते निश्चयलोक नामना पोताना शुद्ध परमात्मामां
अवलोकन ते निश्चयलोक छे.
‘‘सण्णाओ य तिलेस्सा इंदियवसदाय अत्तरुद्दाणि णाणं च दुप्पउत्तं
मोहो पावप्पदा होंति ।। (श्री पंचास्तिकाय गाथा १४०.)
[अर्थःसंज्ञा, त्रण लेश्या, इन्द्रियोने वश थवुं, आर्त अने रौद्र ध्यान, दुष्प्रयुक्त
(खोटा काममां जोडायेलुं ) ज्ञान अने मोहए बधां पाप आपनार छे.]’’आ गाथामां
कहेला विभावपरिणामथी शरू करीने समस्त शुभाशुभ संकल्पविकल्प त्यागीने, निज
शुद्धात्मभावनाथी उत्पन्न परमआह्लादरूप एक सुखामृतना रसास्वादना अनुभवथी जे
भावना होय, ते ज निश्चयलोकानुप्रेक्षा छे. बाकीनी व्यवहारथी छे.
ए रीते, संक्षेपथी लोक - अनुप्रेक्षानुं व्याख्यान समाप्त थयुं. १०.
सौधर्मादिषु स्वर्गेषु यदुत्कृष्टं तत्परस्मिन् परस्मिन् स्वर्गे सर्वार्थसिद्धिं विहाय जघन्यं चेति
शेषं विशेषव्याख्यानं त्रिलोकसारादौ बोद्धव्यम्
किञ्चआदिमध्यान्तमुक्ते शुद्धबुद्धैकस्वभावे परमात्मनि सकलविमलकेवल-
ज्ञानलोचनेनादर्शे विम्बानीव शुद्धात्मादिपदार्था लोक्यन्ते दृश्यन्ते ज्ञायन्ते परिच्छिद्यन्ते
यतस्तेन कारणेन स एव निश्चयलोकस्तस्मिन्निश्चयलोकाख्ये स्वकीयशुद्धपरमात्मनि अवलोकनं
वा स निश्चयलोकः
‘‘सण्णाओ य तिलेस्सा इंदियवसदाय अत्तरुद्दाणि णाणं च दुप्पउत्तं
मोहो पावप्पदा होंति ’’ इति गाथोदितविभावपरिणाममादिं कृत्वा समस्त-
शुभाशुभसंकल्पविकल्पत्यागेन निजशुद्धात्मभावनोत्पन्नपरमाह्लादैकसुखामृतरसास्वादानुभवनेन च
या भावना सैव निश्चयलोकानुप्रेक्षा
शेषा पुनर्व्यवहारेणेत्येवं संक्षेपेण लोकानुप्रेक्षाव्याख्यानं
समाप्तम् ।।१०।।
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १५९