हवे, बोधिदुर्लभ१ अनुप्रेक्षा कहे छेः एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, संज्ञी,
पर्याप्त, मनुष्य, उत्तमदेश, उत्तमकुळ, सुंदररूप, इन्द्रियोनी पूर्णता, नीरोगपणुं, लांबुं
आयुष्य, उत्तम बुद्धि, सत्धर्मनुं श्रवण, ग्रहण, धारण तथा श्रद्धान, संयम, विषयसुखथी
छूटवुं अने क्रोधादि कषायोनी निवृत्ति — ए बधां उत्तरोत्तर दुर्लभ छे. कदाच काकतालीय
न्यायथी ए बधां प्राप्त थवा छतां तेमनी प्राप्तिरूप ‘बोधि’ना फळभूत एवी स्वशुद्धात्माना
संवेदनात्मक२ निर्मळ धर्मध्यान – शुक्लध्यानरूप परम समाधि दुर्लभ छे. जो प्रश्न करवामां
आवे के परमसमाधि दुर्लभ केम छे? समाधान — तेने (परमसमाधिने) रोकनार मिथ्यात्व,
विषय, कषाय, निदानबंध आदि विभावपरिणामोनुं (जीवमां) प्रबलपणुं छे तेथी
(परमसमाधि दुर्लभ छे). माटे जे (परमसमाधि) ज निरंतर भाववा योग्य छे. तेनी
भावना रहित जीवोनुं फरी फरी संसारमां पतन थाय छे. कह्युं छे केः — ‘‘जो मनुष्य
अथ बोधिदुर्लभानुप्रेक्षां कथयति । तथाहि एकेन्द्रियविकलेन्द्रियपंचेन्द्रियसंज्ञिपर्याप्त-
मनुष्यदेशकुलरूपेन्द्रियपटुत्वनिर्व्याध्यायुष्कवरबुद्धिसद्धर्मश्रवणग्रहणधारणश्रद्धानसंयमविषयसुख-
व्यावर्त्तनक्रोधादिकषायनिवर्त्तनेषु परं परं दुर्लभेषु कथंचित् काकतालीयन्यायेन लब्धेष्वपि
तल्लब्धिरूपबोधेः फलभूतस्वशुद्धात्मसंवित्त्यात्मकनिर्मलधर्मध्यानशुक्लध्यानरूपः परमसमाधि-
र्दुर्लभः । कस्मादिति चेत्तत्प्रतिबन्धकमिथ्यात्वविषयकषायनिदानबन्धादिविभावपरिणामानां
प्रवलत्वादिति । तस्मात् स एव निरन्तरं भावनीयः । तद्भावनारहितानां पुनरपि संसारे
पतनमिति । तथा चोक्तम् — ‘‘इत्यतिदुर्लभरूपां बोधिं लब्ध्वा यदि प्रमादी स्यात् ।
संसृतिभीमारण्ये भ्रमति वराको नरः सुचिरम् ।१।’’ पुनश्चोक्तं मनुष्यभवदुर्लभत्वम् —
१. बोधिदुर्लभ अनुप्रेक्षा संबंधमां श्री जयचंद्रजी पंडित कृत ‘बार भावना’ ग्रंथमां कह्युं छे केः —
बोधि आपका भाव है निश्चय दुर्लभ नाहि ।
भवमें प्राप्ति कठिन है यह व्यवहार कहाहि ।। (बोधि दुर्लभ)
अर्थः — बोधि (ज्ञान) आत्मानो स्वभाव छे, तेथी ते निश्चयथी दुर्लभ नथी. संसारमां आत्मज्ञान
(बोधि) ने दुर्लभ तो व्यवहारनयथी कहेल छे.
२. श्री कुंदकुंदाचार्यदेव द्वादशानुप्रेक्षा शास्त्रनी गाथा ८४ मां कहे छे केः — ‘‘कर्मोदयथी थती पर्यायना कारणे
क्षायोपशमिक ज्ञान हेय छे तथा निज आत्मद्रव्य उपादेय छे, एवो निश्चय थवो ते सम्यग्ज्ञान छे.’’
तथा गाथा ८६ मां कहे छे केः — ‘‘ए प्रकारे स्वद्रव्य तथा परद्रव्यनुं चिंतवन करवाथी हेय – उपादेयनुं
ज्ञान थाय छे, पण निश्चयनयमां हेय – उपादेयनो विकल्प नथी. मुनिओए संसारनो विराम करवा माटे
बोधिनुं चिंतवन करवुं जोईए.’’ (बोधिदुर्लभ भावना.)
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बृहद् – द्रव्यसंग्रह