Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 35 : Dharma Anupreksha.

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अत्यंत दुर्लभ एवी ‘बोधि’ ने पामीने पण प्रमादी थाय छे, तो ते बिचारो संसाररूपी
भयंकर वनमां लांबा समय सुधी भ्रमण करे छे.
’’
वळी, मनुष्यभवनी दुर्लभता विषे कह्युं छे‘‘अशुभ परिणामोनी बहुलता,
संसारनी विशाळता, योनियोनी अति मोटी विपुलताआ बधुं मनुष्ययोनिने बहु दुर्लभ
बनावे छे. १.’’
हवे, बोधि अने समाधिनुं लक्षण कहे छे. नहि प्राप्त करेल सम्यग्दर्शन, ज्ञान,
चारित्रनी प्राप्ति करवी ते बोधि छे अने तेमने (सम्यग्दर्शनादिने) ज निर्विघ्नपणे बीजा
भवमां साथे लई जवां ते समाधि छे. आ रीते संक्षेपमां (बोधि) दुर्लभ अनुप्रेक्षा समाप्त
थई. ११.
हवे, धर्म अनुप्रेक्षा कहे छे. ते आ प्रमाणेसंसारमां पडता जीवने उद्धारीने
नागेन्द्र, चक्रवर्ती, देवेन्द्र वगेरेथी पूज्य, अव्याबाध अनंत सुखादि अनंत गुणोरूप
लक्षणवाळा मोक्षपदमां जे मूके छे ते धर्म छे. ते धर्मना भेद कहेवामां आवे छे.
अहिंसालक्षणवाळो, गृहस्थ
अने मुनिरूप लक्षणवाळो, उत्तम क्षमादि लक्षणवाळो, निश्चय-
व्यवहार रत्नत्रयात्मक अथवा शुद्धात्माना संवेदनरूप मोहक्षोभरहित आत्माना परिणाम-
वाळो धर्म छे. आ धर्मनी प्राप्ति नहीं थवाथी अनंत भूतकाळमां ‘‘णिच्चिदरधाउसत्त य तरुदस
‘‘अशुभपरिणामबहुलता लोकस्य विपुलता, महामहती योनिविपुलता च कुरुते सुदुर्लभां
मानुषीं योनिम् ’’ बोधिसमाधिलक्षणं कथ्यतेसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणामप्राप्तप्रापणं
बोधिस्तेषामेव निर्विघ्नेन भवान्तरप्रापणं समाधिरिति एवं संक्षेपेण दुर्लभानुप्रेक्षा समाप्ता ।।११।।
अथ धर्मानुप्रेक्षां कथयति तद्यथासंसारे पतन्तं जीवमुद्धृत्य
नागेन्द्रनरेन्द्रदेवेन्द्रादिवन्द्ये अव्याबाधानंतसुखाद्यनंतगुणलक्षणे मोक्षपदे धरतीति धर्मः तस्य च
भेदाः कथ्यन्तेअहिंसालक्षणः सागारानगारलक्षणो वा उत्तमक्षमादिलक्षणो वा
निश्चयव्यवहाररत्नत्रयात्मको वा शुद्धात्मसंवित्त्यात्मकमोहक्षोभरहितात्मपरिणामो वा धर्मः
अस्य धर्मस्यालाभेऽतीतानन्तकाले ‘‘णिच्चिदरधाउसत्त य तरुदस वियलेंदियेसु छच्चेव
१. परमात्मप्रकाश गाथा ९ टीका
२. अज्ञात शास्त्रनी गाथाथी.
३. श्री कुंदकुंदाचार्यदेव धर्मअनुप्रेक्षा गाथा ८२ मां कहे छे के
‘‘निश्चयनयथी जीव गृहस्थधर्म अने
मुनिधर्मथी भिन्न छे, माटे बन्ने धर्मोमां मध्यस्थ भावना राखी निरंतर शुद्ध आत्मानुं चिंतवन करवुं.’’
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १६१