Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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वियलेंदियेसु छच्चेव सुरणिरयतिरियचउरो चउदस मणुयेसु सदसहस्सा ।।’’ [अर्थःवनस्पतिमां
सात लाख, इतर निगोद वनस्पतिमां सात लाख, पृथ्वीकायमां सात लाख, जळकायमां
सात लाख, तेजकायमां सात लाख, वायुकायमां सात लाख, प्रत्येक वनस्पतिमां दस लाख,
बे इन्द्रिय, त्रण इन्द्रिय अने चौरिन्द्रियमां बब्बे लाख, देव
नारकी अने तिर्यंचमां चार
चार लाख तथा मनुष्योमां चौद लाख]’’ ए प्रमाणे आ गाथामां कह्या प्रमाणे चोर्यासी
लाख योनिओमां, परम स्वास्थ्य भावनाथी उत्पन्न निर्व्याकुळ पारमार्थिकसुखथी विपरीत
पंचेन्द्रिय सुखनी अभिलाषाथी उत्पन्न व्याकुळताने उत्पन्न करनारां दुःखोने सहन करतो
आ जीव भम्यो छे. ज्यारे जीवने आवा प्रकारना विशिष्ट गुणवाळा धर्मनी प्राप्ति थाय
छे त्यारे राजाधिराज, अर्धमांडलिक, महामांडलिक, बळदेव, वासुदेव, कामदेव, चक्रवर्ती,
देवेन्द्र, गणधरदेव अने तीर्थंकर परमदेवना पद तथा तीर्थंकरना प्रथम त्रण कल्याणको (गर्भ,
जन्म अने तप) सुधीना विविध प्रकारना वैभवनां सुखो पामीने पछी अभेद रत्नत्रयनी
भावनाना बळथी अक्षय अनंत सुखादि गुणोनां स्थानभूत अर्हंतपद अने सिद्धपदने प्राप्त
करे छे. ते कारणे धर्म ज परमरसनुं रसायण, निधिओनुं निधान, कल्पवृक्ष, कामधेनु अने
चिन्तामणि छे. विशेष शुं कहेवुं? जेओ जिनेन्द्रदेवे कहेला धर्मने पामीने द्रढ श्रद्धावाळा
(सम्यक्द्रष्टि) थया छे, ते ज धन्य छे. कह्युं पण छे के
‘‘धन्या ये प्रतिबुद्धा धर्मे खलु जिनवरैः
समुपदिष्टे ये प्रतिपन्ना धर्मं स्वभावनोपस्थितमनीषाः ।।’’ [अर्थःजिनवरोए सम्यक् प्रकारे
उपदेशेला धर्मथी जेओ प्रतिबोध पाम्या छे, ते खरेखर धन्य छे अने जेओए स्व
भावनामां पोतानी बुद्धि जोडीने धर्म प्राप्त कर्यो छे, तेओने धन्य छे.]’’
सुरणिरयतिरियचउरो चउदस मणुयेसु सदसहस्सा ’’ इति गाथाकथितचतुरशीतियोनिलक्षेषु
मध्ये परमस्वास्थ्यभावनोत्पन्ननिर्व्याकुलपारमार्थिकसुखविलक्षणानि पञ्चेन्द्रियसुखाभिलाषजनित-
व्याकुलत्वोत्पादकानि दुःखानि सहमानः सन् भ्रमितोऽयं जीवः
यदा पुनरेवंगुणविशिष्टस्य
धर्मस्य लाभो भवति तदा राजाधिराजार्द्धमाण्डलिकमहामाण्डलिकबलदेववासुदेवकामदेव-
सकलचक्रवर्त्तिदेवेन्द्रगणधरदेवतीर्थंकरपरमदेव प्रथमकल्याणत्रयपर्यन्तं विविधाभ्युदयसुखं प्राप्य
पश्चादभेदरत्नत्रयभावनाबलेनाक्षयानंतसुखादिगुणास्पदमर्हत्पदं सिद्धपदं च लभते
तेन कारणेन
धर्म एव परमरसरसायनं निधिनिधानं कल्पवृक्षः कामधेनुश्चिन्तामणिरिति किं बहुना, ये
जिनेश्वरप्रणीतं धर्मं प्राप्य दृढमतयो जातास्त एव धन्याः तथा चोक्तम् ‘‘धन्या ये प्रतिबुद्धा
धर्मे खलु जिनवरैः समुपदिष्टे ये प्रतिपन्ना धर्मं स्वभावनोपस्थितमनीषाः ’’ इति
१. श्री गोम्मटसार जीवकांड गाथा ८९२. अज्ञात शास्त्रनी गाथाथी.
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