Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 36 : Sanvarpoorvak Nirjara Tattvanu Swaroop.

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अक्रियावादीओना चोर्यासी, अज्ञानीओना सडसठ अने वैनयिकोना बत्रीस; एवी रीते कुल
पाखंडीओना त्रणसो त्रेसठ भेद छे.]’’
‘‘जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुभागा कसायदो हुंति
अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधो ठिदिकारणं णत्थि ।। [अर्थःयोगथी प्रकृति अने प्रदेश तथा
कषायथी स्थिति अने अनुभागबंध थाय छे, जेमने कषायनो उदय नथी तथा कषायोनो
क्षय थाय छे तेमने (उपशान्त कषाय, क्षीणकषाय अने सयोगी केवळीने) तत्कालबंध (एक
समयनो बंध) स्थितिनुं कारण नथी.]’’ ३५.
आ रीते, संवरतत्त्वना व्याख्यानमां बे सूत्रो वडे त्रीजुं स्थळ पूरुं थयुं.
हवे, सम्यग्द्रष्टि जीवने संवर पूर्वक निर्जरातत्त्व कहे छेः
गाथा ३६
गाथार्थः(आत्माना) जे भावथी यथासमय अथवा तप वडे फळ दईने
कर्मपुद्गलो नष्ट थाय छे ते निर्जरा (भावनिर्जरा) जाणवी तथा कर्मपुद्गलोनुं नष्ट थवुं
ते निर्जरा (द्रव्यनिर्जरा) जाणवी. ए प्रमाणे निर्जरा बे प्रकारनी छे.
टीकाः‘णेया’ वगेरे सूत्रनुं व्याख्यान करे छेः ‘णेया’जाणवी. शुं?
जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुभागा कसायदो हुंति अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधो ठिदिकारणं
णत्थि ’’ ।।३५।। एवं संवरतत्त्वव्याख्याने सूत्रद्वयेन तृतीयं स्थलं गतम्
अथ सम्यग्दृष्टिजीवस्य संवरपूर्वकं निर्जरातत्त्वं कथयति :
जह कालेण तवेण य भुत्तरसं कम्मपुग्गलं जेण
भावेण सडदि णेया तस्सडणं चेदि णिज्जरा दुविहा ।।३६।।
यथाकालेन तपसा च भुक्तरसं कर्म्मपुद्गलं येन
भावेन सडति ज्ञेया तत्सडनं चेति निर्जरा द्विविधा ।।३६।।
व्याख्या :‘‘णेया’’ इत्यादिव्याख्यानं क्रियते‘‘णेया’’ ज्ञातव्या का ?
३. श्री गोम्मटसार कर्मकांड गाथा २५७.
जथा काल अर तपपरभाव, कर्म निर्जरै रस दे जाय;
जिनि भावनितैं होय सुभाव, कर्म झडै, इम दोय गिनाव. ३६.
सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार [ १६७