Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration).

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‘द्रव्यसंग्रह’ नामना आप्रत्यक्ष ग्रन्थने. केवा द्रव्यसंग्रह ग्रन्थने? ‘‘भणियं जं’’ जे ग्रन्थनुं
प्रतिपादन करवामां आव्युं छे तेने. कोणे प्रतिपादन कर्युं छे? ‘‘णेमिचन्दमुणिणा’’
सम्यग्दर्शन आदि निश्चय - व्यवहाररूप पंचाचार सहित आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव
नामना मुनिए.
केवा नेमिचंद्र मुनिए? ‘‘तणुसुत्तधरेण’’ अल्पश्रुतधारीए. जे अल्पश्रुतने धारण करे
ते अल्पश्रुतधारी छे. (तेमणे आ ग्रंथनुं प्रतिपादन कर्युं छे.) ए प्रमाणे क्रिया अने कारकोनो
संबंध छे.
ए रीते ध्यानना उपसंहाररूप त्रण गाथाओ वडे अने उद्धतपणाना त्यागने माटे
एक प्राकृत छंदथी बीजा अन्तराधिकारमां त्रीजुं स्थळ समाप्त थयुं. ५८.
एवी रीते बे अंतराधिकारो द्वारा वीस गाथाओथी मोक्षमार्गनो प्रतिपादक त्रीजो
अधिकार समाप्त थयो.
आ ग्रंथमां ‘विवक्षित विषयनी संधि थाय छे’ ए वचन प्रमाणे पदोनी संधिनो
नियम नथी. (क्यांक संधि करवामां आवी छे, क्यांक नहि.) सरळताथी बोध थाय माटे
वाक्यो नानां नानां बनाववामां आव्यां छे. लिंग, वचन, क्रियाकारकसंबंध, समास, विशेषण
अने वाक्यसमाप्ति आदि दोष अने शुद्धात्मा आदि तत्त्वोना कथनमां विस्मरणनो दोष
द्रव्यसंग्रहाभिधानम् ग्रन्थमिमं प्रत्यक्षीभूतम् किं विशिष्टं ? ‘‘भणियं जं’’ भणितः
प्रतिपादितो यौ ग्रन्थः केन कर्तृभूतेन ? ‘‘णेमिचन्दमुणिणा’’ श्री नेमिचन्द्रमुनिना श्री
नेमिचन्द्रसिद्धान्तिदेवाभिधानेन मुनिना सम्यग्दर्शनादिनिश्चयव्यवहाररूपपञ्चाचारोपेताचार्येण
कथम्भूतेन ? ‘‘तणुसुत्तधरेण’ तनुश्रुतधरेण तनुश्रुतं स्तोकं श्रुतं तद्धरतीति तनुश्रुतधरस्तेन
इति क्रियाकारकसम्बन्धः एवं ध्यानोपसंहारगाथात्रयेण, औद्धत्यपरिहारार्थं प्राकृतवृत्तेन च
द्वितीयान्तराधिकारे तृतीयं स्थलं गतम् ।।५८।। इत्यन्तराधिकारद्वयेन विंशतिगाथाभिर्मोक्ष-
मार्गप्रतिपादकनामा तृतीयोऽधिकारः समाप्तः
अत्र ग्रन्थे ‘विवक्षितस्य सन्धिर्भवति’ इति वचनात्पदानां सन्धिनियमो नास्ति
वाक्यानि च स्तोकस्तोकानि कृतानि सुखबोधनार्थम् तथैव लिङ्गवचनक्रियाकारक-
सम्बन्धसमासविशेषणवाक्यसमाप्त्यादिदूषणं तथा च शुद्धात्मादिप्रतिपादनविषये विस्मृतिदूषणं च
१. निश्चय - व्यवहार पंचाचार एक साथे भावलिंगी मुनिओने ज होय छे, एम अहीं स्पष्ट कर्युं छे.
मोक्षमार्ग अधिकार [ २६३