Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Laghudravyasangrah: , Gatha: 1-5 (Laghudravyasangrah).

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लघाुद्रव्यसंग्रह
छद्दव्वं पंच अत्थी सत्त वि तच्चाणि णव पयत्था य
भंगुप्पायधुवत्ता णिद्दिट्ठा जेण सो जिणो जयउ ।।।।
अर्थःजेमणे छ द्रव्य, पांच अस्तिकाय, सात तत्त्व, नव पदार्थ अने उत्पाद
- व्यय - ध्रौव्यनो निर्देश कर्यो छे ते श्री जिनेन्द्रदेव जयवंत रहो. १.
जीवो पुग्गल धम्माऽधम्मागासो तहेव कालो य
दव्वाणि कालरहिया पदेश बाहुल्लदो अत्थिकाया य ।।।।
अर्थःजीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश अने काळ (ए छ) द्रव्यो छे; काळ
सिवायनां बाकीनां पांच द्रव्यो, बहुप्रदेशी होवाने कारणे अस्तिकाय छे. २.
जीवाजीवासवबंध संवरो णिज्जरा तहा मोक्खो
तच्चाणि सत्त एदे सपुण्णपावा पयत्त्था य ।।।।
अर्थःजीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा अने मोक्ष ए सात तत्त्वो
छे; ए सात तत्त्व पुण्य अने पाप सहित नव पदार्थ छे. ३.
जीवो होइ अमुत्तो सदेहमित्तो सचेयणा कत्ता
भोत्ता सो पुण दुविहो सिद्धो संसारिओ णाणा ।।।।
अर्थःजीव (द्रव्य) अमूर्तिक, स्वदेहप्रमाण, सचेतन, कर्ता अने भोक्ता छे.
ते जीव बे प्रकारना छे, सिद्ध अने संसारी; संसारी जीव अनेक प्रकारना छे. ४.
अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेयणागुणमसद्दं
जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिदिट्ठसंट्ठाणं ।।।।
अर्थःजीवने रसरहित, रूपरहित, गंधरहित, अव्यक्त, शब्दरहित, लिंग द्वारा
न ग्रही शकाय तेवो, जेनुं संस्थान निर्दिष्ट नथी एवो अने चेतना गुणवाळो जाणवो. ५.
लघुद्रव्यसंग्रह [ २६५