Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 6-11 (Laghudravyasangrah).

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वण्णरस गंधफासा विज्जंते जस्स जिणवरुद्दिट्ठा
मुत्तो पुग्गलकाओ पुढवी पहुदी हु सो सोढा ।।।।
अर्थःजेने वर्ण, रस, गंध अने स्पर्श विद्यमान छे ते मूर्तिक पुद्गलकाय पृथ्वी
वगेरे छ प्रकारनी श्री जिनेंद्रदेवे कही छे. ६.
पुढवी जलं च छाया चउरिंदियविसय कम्म परमाणू
छव्विहभेयं भणियं पुग्गलदव्वं जिणिंदेहिं ।।।।
अर्थःपृथ्वी, जळ, छाया, (नेत्रेन्द्रिय सिवायनी) चार इन्द्रियोना विषयो,
कर्मवर्गणा अने परमाणु; श्री जिनेंद्रदेवे पुद्गल द्रव्यने (उपरोक्त) छ प्रकारनुं कह्युं
छे. ७.
गईपरिणयाण धम्मो पुग्गलजीवाण गमणसहयारी
तोयं जह मच्छाणं अच्छंता णेव सो णेई ।।।।
अर्थःगतिरूपे परिणमेला पुद्गल अने जीवोने गमनमां सहकारी धर्मद्रव्य छे,
जेम माछलीने (गमन करवामां) जळ सहकारी छे. गमन न करनार (पुद्गल अने जीवो)
ने ते (
धर्मद्रव्य) गति करावतुं नथी. ८.
ठाणजुयाण अधम्मो पुग्गलजीवाण ठाणसहयारी
छाया जह पहियाणं गच्छांता णेव सो धरई ।।।।
अर्थःस्थित थता पुद्गल अने जीवोने स्थिर थवामां सहकारी अधर्मद्रव्य छे;
जेम छांयो मुसाफरोने स्थिर थवामां सहकारी छे. गमन करता जीव अने पुद्गलोने ते
(अधर्म द्रव्य) स्थिर करावतुं नथी. ९.
अवगासदाणजोग्गं जीवादीणं वियाण आयासं
जेण्हं लोगागासं अल्लोगागासमिदि दुविहं ।।१०।।
अर्थःजे जीव आदि द्रव्योने अवकाश देवाने योग्य छे तेने (श्री जिनेंद्रदेवे
कहेल) आकाश द्रव्य जाणो. जेना लोकाकाश अने अलोकाकाश एवा बे प्रकार छे. १०.
द्रव्यपरियट्टजादो जो सो कालो हवेइ ववहारो
लोगागासपएसो एक्केक्काणु य परमट्ठो ।।११।।
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बृहद्द्रव्यसंग्रह