Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 12-16 (Laghudravyasangrah).

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अर्थःजे द्रव्योना परिवर्तनथी उत्पन्न थाय छे ते व्यवहारकाळ छे; लोकाकाशमां
दरेक प्रदेश उपर एकेक कालाणु स्थित छे, ते परमार्थ (निश्चय) काळ छे. ११.
लोयायासपदेसे एक्केक्के जि ट्ठिया हु एक्केक्का
रयणाणं रासीमिव ते कालाणू असंखदव्वाणि ।।१२।।
अर्थःजे लोकाकाशना एकेक प्रदेश उपर रत्नोनी राशि जेम एकेक (कालाणु)
स्थित छे, ते कालाणु असंख्यात द्रव्य छे. १२.
संखातीदा जीवे धम्माऽधम्मे अणंत आयासे
संखादासंखादा मुत्ति पदेसाउ संति णो काले ।।१३।।
अर्थःएक जीवद्रव्यमां, धर्मद्रव्यमां अने अधर्मद्रव्यमां असंख्यात प्रदेशो छे,
आकाश द्रव्यमां अनंत प्रदेश छे, पुद्गलमां संख्यात, असंख्यात अने अनंत प्रदेशो छे;
काळमां प्रदेशो नथी. (काळाणु एकप्रदेशी छे, तेमां शक्ति अथवा व्यक्तिनी अपेक्षाए
बहुप्रदेशीपणुं नथी.) १३.
जावदियं आयासं अविभागीपुग्लाणुवट्टद्धं
तं खु पदेसं जाणे सव्वाणुट्ठाणदाणरिहं ।।१४।।
अर्थःअविभागी पुद्गल अणु वडे जेटलुं आकाश रोकाय तेने प्रदेश जाणो.
ते प्रदेश बधा (पुद्गल) परमाणुओने स्थान देवामां समर्थ छे. १४.
जीवो णाणी पुग्गलधम्माऽधम्मायासा तहेव कालो य
अज्जीवा जिणभणिओ ण हु मण्णइ जो हु सो मिच्छो ।।१५।।
अर्थःजीव ज्ञानी छे, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश अने काळ अजीव छे,
एम श्री जिनेंद्रदेवे कह्युं छे, जे आम नथी मानतो ते मिथ्याद्रष्टि छे. १५.
मिच्छत्तं हिंसाई कसाय - जोगा य आसवो बंधो
सकसाई जं जीवो परिगिण्हइ पोग्गलं विविहं ।।१६।।
अर्थःमिथ्यात्व, हिंसा आदि (अव्रत), कषाय अने योगोथी आस्रव थाय छे;
कषाय सहित जीव जे विविध प्रकारनां पुद्गलोने ग्रहण करे छे ते बंध छे. १६.
लघुद्रव्यसंग्रह [ २६७