Bruhad Dravya Sangrah-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 17-22 (Laghudravyasangrah).

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मिच्छत्ताईचाओ संवर जिण भणइ णिज्जरादेसे
कम्माण खओ सो पुण अहिलसिओ अणहिलसिओ य ।।१७।।
अर्थःश्री जिनेंद्रदेवे मिथ्यात्व आदिना त्यागने संवर कहेल छे, कर्मोनो एकदेश
क्षय ते निर्जरा छे अने ते (निर्जरा) अभिलाषा सहित अने अभिलाषा रहित (सकाम,
अकाम) एम बे प्रकारनी छे. १७.
कम्म बंधणबद्धस्य सब्भूदस्संतरप्पणो
सव्वकम्मविणिम्मुक्को मोक्खो होइ जिणेडिदो ।।१८।।
अर्थःकर्मोना बंधनथी बद्ध सद्भूत (प्रशस्त) अंतरात्माने जे सर्वकर्मोथी
(पूर्णपणे) मुक्त थवुं ते मोक्ष छेएम श्री जिनेंद्रदेवे वर्णन कर्युं छे. १८.
सादाऽऽउणामगोदाणं पयडीओ सुहा हवे
पुण्ण तित्त्थयरादी अण्णं पावं तु आगमे ।।१९।।
अर्थःशातावेदनीय, शुभ आयुष्य, शुभ नाम अने शुभ गोत्र तेम ज तीर्थंकर
आदि प्रकृतिओ ते पुण्य - प्रकृतिओ छे; बाकीनी बीजी पाप - प्रकृतिओ छे, एम परमागममां
कह्युं छे. १९.
णासइ णर - पज्जाओ उप्पज्जइ देवपज्जओ तत्थ
जीवो स एव सव्वस्सभंगुप्पाया धुवा एवं ।।२०।।
अर्थःमनुष्य पर्याय नाश पामे छे, देव पर्याय उत्पन्न थाय छे अने जीव तेनो
ते ज रहे छे; एवी रीते सर्व द्रव्योने उत्पाद - व्यय - ध्रौव्य होय छे. २०.
उप्पादप्पद्धंसा वत्त्थूणं होंति पज्जय - णाएण (णयण)
दव्वट्ठिएण णिच्चा बोधव्वा सव्वजिणवुत्ता ।।२१।।
अर्थःवस्तुमां उत्पाद अने व्यय पर्यायनयथी थाय छे, द्रव्यद्रष्टिथी वस्तु नित्य
छे एम जाणवुं; श्री सर्वज्ञ जिनेन्द्रदेवे आम कह्युं छे. २१.
एवं अहिगयसुत्तो सट्ठाणजुदो मणो णिरुंभिता
छंडउ रायं रोसं जइ इच्छइ कम्मणो णास (णासं) ।।२२।।
अर्थःजो कर्मोनो नाश करवा इच्छता हो तो ते प्रमाणे सूत्रना ज्ञाता थईने,
पोतानामां स्थित रहीने अने मनने रोकीने राग अने द्वेषने छोडो. २२.
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