जाणे छे तेने केवळज्ञान कहे छे.
थया पछी व्रत होय छे.)
धर्मोने जाणी शकता नथी---एम मानवुं ते असत्य छे. अने ते अनंतने
अथवा मात्र पोताना आत्माने ज जाणे पण सर्वने न जाणे एम
मानवुं ते पण न्यायथी विरुद्ध छे. (लघु जैन सि. प्रवेशिका प्र० ८७,
पा० २६) केवळज्ञानी भगवान क्षायोपशमिक ज्ञानवाळा जीवोनी
माफक अवग्रह, इहा, अवाय अने धारणारूप क्रमथी जाणता नथी
परंतु सर्व द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावने युगपत् (एकसाथे) जाणे छे ए रीते
तेमने बधुंय प्रत्यक्ष वर्ते छे(प्रवचनसार गा० २१ नी टीका भावार्थ)
अति विस्तारथी बस थाओ. अनिवारित (रोकी न शकाय एवो
अमर्यादित) जेनो फेलाव छे एवा प्रकाशवाळुं होवाथी क्षायिकज्ञान
(केवळज्ञान) अवश्यमेव, सर्वदा, सर्वत्र, सर्वथा, सर्वने जाणे छे.
(प्रवचनसार गा. ४७ नी टीका)
आडाअवळा थता नथी.