Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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(अनन्तधर्मात्मक *सर्व द्रव्य-गुण-पर्यायने) प्रत्येक
समयमां यथास्थित, परिपूर्णरूपे स्पष्ट अने एकसाथे
जाणे छे तेने केवळज्ञान कहे छे.
विपर्ययःऊंधुं ज्ञान; जेमके छीपने चांदी जाणवी, चांदीने छीप
जाणवी.
व्रतःशुभ कार्य करवां अशुभ कार्य छोडवा ते; अथवा हिंसा,
असत्य, चोरी, मैथुन अने परिग्रहए पांच पापोथी
भावपूर्वक विरक्त थवुं तेने व्रत कहे छे. (सम्यग्दर्शन
थया पछी व्रत होय छे.)
शिक्षाव्रतःमुनिव्रत पाळवानी शिक्षा देनारुं व्रत.
*द्रव्य, गुण, पर्यायोने केवळज्ञानी भगवान जाणे छे पण तेना अपेक्षित
धर्मोने जाणी शकता नथी---एम मानवुं ते असत्य छे. अने ते अनंतने
अथवा मात्र पोताना आत्माने ज जाणे पण सर्वने न जाणे एम
मानवुं ते पण न्यायथी विरुद्ध छे. (लघु जैन सि. प्रवेशिका प्र० ८७,
पा० २६) केवळज्ञानी भगवान क्षायोपशमिक ज्ञानवाळा जीवोनी
माफक अवग्रह, इहा, अवाय अने धारणारूप क्रमथी जाणता नथी
परंतु सर्व द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावने युगपत् (एकसाथे) जाणे छे ए रीते
तेमने बधुंय प्रत्यक्ष वर्ते छे(प्रवचनसार गा० २१ नी टीका भावार्थ)
अति विस्तारथी बस थाओ. अनिवारित (रोकी न शकाय एवो
अमर्यादित) जेनो फेलाव छे एवा प्रकाशवाळुं होवाथी क्षायिकज्ञान
(केवळज्ञान) अवश्यमेव, सर्वदा, सर्वत्र, सर्वथा, सर्वने जाणे छे.
(प्रवचनसार गा. ४७ नी टीका)
नोंधः---श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान अने केवळज्ञानथी सिद्ध
थाय छे के प्रत्येक द्रव्यमां निश्चित अने क्रमबद्ध पर्याय थाय छे
आडाअवळा थता नथी.
१३२ ][ छ ढाळा