श्रुतज्ञानः — १-मतिज्ञानथी जाणेला पदार्थोना संबंधथी अन्य
पदार्थोने जाणवावाळा ज्ञानने श्रुतज्ञान कहे छे.
२ आत्मानी शुद्ध अनुभूतिरूप श्रुतज्ञानने भावश्रुतज्ञान
कहे छे.
संन्यासः — (संल्लेखना)-आत्मानो धर्म समजीने पोतानी शुद्धता
माटे कषायोने अने शरीरने कृश करवां (शरीर तरफनुं
लक्ष छोडी देवुं) ते समाधि अथवा संल्लेखना कहेवाय
छे.
संशयः — विरोधता सहित अनेक प्रकारोने अवलंबन करनारुं
ज्ञान जेमके-आ छीप हशे के चांदी हशे? आत्मा
पोतानुं ज कार्य करी शकतो हशे के परनुं पण करी
शकतो हशे? देव-शास्त्र-गुरु, जीवादि सात तत्त्व
वगेरेनुं स्वरूप आवुं ज हशे के अन्य मतमां कहे छे
तेवुं हशे?
चोथी ढाळनुं अंतर-प्रदर्शन
१. दिग्व्रतनी मर्यादा तो जिंदगी सुधीने माटे छे पण देशव्रतनी
मर्यादा घडी, कलाक वगेरे मुकरर करेल वखत सुधीनी छे.
२. परिग्रहपरिमाण व्रतमां परिग्रहनुं जेटलुं प्रमाण (मर्यादा)
करवामां आवे छे तेनाथी पण ओछुं प्रमाण भोगोप-
भोगपरिमाण व्रतमां करवामां आवे छे.
३पौषधमां तो आरंभ अने विषय-कषायादिनो त्याग करवा
चोथी ढाळ ][ १३३