बार भावनानुं चिंतवन मुख्यपणे वीतराग दिगम्बर जैन
मुनिराजने ज होय छे, अने गौणपणे सम्यग्द्रष्टिने होय छे. जेम
पवन लागवाथी अग्नि भभूकी ऊठे छे तेम अंतरंग परिणामोनी
शुद्धता सहित, आ भावनाओनुं चिंतवन करवाथी समताभाव
प्रगट थाय छे, अने तेनाथी मोक्षसुख प्रगट थाय छे.
स्वसन्मुखतापूर्वक आ भावनाओथी संसार, शरीर अने भोगो
प्रत्ये विशेष उपेक्षा थाय छे, अने आत्माना परिणामोनी
निर्मळता वधे छे. [आ बार भावनाओनुं स्वरूप विस्तारथी
जाणवुं होय तो ‘स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा’, ‘ज्ञानार्णव’ वगेरे
ग्रंथोनुं अवलोकन करवुं.]
ए तो जेम प्रथम कोईने मित्र मानतो हतो त्यारे तेनाथी राग
हतो अने पाछळथी तेनो अवगुण जोईने उदासीन थयो, तेम
पहेलां शरीरादिथी राग हतो पण पाछळथी तेना अनित्यादि
अवगुण देखी आ उदासीन थयो, परंतु एवी उदासीनता तो
द्वेषरूप छे, पण ज्यां जेवो पोतानो वा शरीरादिकनो स्वभाव छे
तेवो ओळखी, भ्रम छोडी, तेने भलां जाणी राग न करवो तथा
बूरां जाणी द्वेष न करवो, एवी साची उदासीनता अर्थे
अनित्यता वगेरेनुं यथार्थ चिंतवन करवुं ए ज साची अनुप्रेक्षा
छे.