पांचमी ढाळ ][ १५५
आश्रयवडे प्रगट करे छे त्यारे ज ते स्थिर, अक्षयसुखने
(मोक्षने) प्राप्त करे छे, आवी रीते चिंतवन करी सम्यग्द्रष्टि
जीव स्वसन्मुखतानो अभ्यास वारंवार करे छे. ते धर्म भावना
छे. १४.
आत्माना अनुभवपूर्वक भावलिंगी मुनिनुं स्वरुप
सो धर्म मुनिनकरि धरिये, तिनकी करतूति उचरिये;
ताकों सुनिये भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी. १५.
अन्वयार्थः — (सो) एवो रत्नत्रयस्वरूप (धर्म) धर्म
(मुनिनकरि) मुनिओ द्वारा (धरिये) धारण करवामां आवे छे
(तिनकी) ते मुनिओनी (करतूति) क्रियाओ (उचरिये) कहेवामां
आवे छे. (भवि प्रानी) हे भव्य जीवो! (ताको) तेने (सुनिये)
सांभळो, अने (अपनी) पोताना आत्माना (अनुभूति)
अनुभवने (पिछानो) ओळखो.
भावार्थः — निश्चयरत्नत्रयस्वरूप धर्मने भावलिंगी
दिगंबर जैन मुनि ज अंगीकार करे छे – बीजो कोई नहि. हवे
आगळ ते मुनिओना सकलचारित्रनुं वर्णन करवामां आवे छे.
हे भव्यो! ते मुनिवरोना चारित्र सांभळो अने पोताना
आत्मानो अनुभव करो. १५.
पांचमी ढाळनो सारांश
आ बार भावना ते चारित्रगुणना आंशिक शुद्ध पर्यायो छे;
तेथी ते सम्यग्द्रष्टि जीवने ज होई शके छे. सम्यक् प्रकारे आ बार