Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 14 (Dhal 5).

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१५४ ][ छ ढाळा
१२धार्म भावना
जो भाव मोहतैं न्यारे, द्रग-ज्ञान-व्रतादिक सारे;
सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारै. १४.
अन्वयार्थ(मोहतैं) मोहथी (न्यारे) जुदा, (सारे)
साररूप अर्थात् निश्चय (जो) जे (द्रग-ज्ञान-व्रतादिक) दर्शन-
ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय आदिक (भाव) भाव छे (सो) ते
(धर्म) धर्म कहेवाय छे. (जबै) ज्यारे (जिय) जीव (धारै) तेने
धारण करे छे (तब ही) त्यारे ज ते (अचल सुख) अचळ
सुख-मोक्ष (निहारै) देखे छे-पामे छे.
भावार्थमोह एटले मिथ्यादर्शन अर्थात्
अतत्त्वश्रद्धान, तेनाथी रहित निश्चयसम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान अने
सम्यक्चारित्र (रत्नत्रय) ज साररूप धर्म छे. व्यवहाररत्नत्रय
ते धर्म नथी एम बताववा माटे अहीं गाथामां ‘सारे’ शब्द
वापर्यो छे. ज्यारे जीव निश्चयरत्नत्रयस्वरूप धर्मने स्व-