सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारै. १४.
ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय आदिक (भाव) भाव छे (सो) ते
(धर्म) धर्म कहेवाय छे. (जबै) ज्यारे (जिय) जीव (धारै) तेने
धारण करे छे (तब ही) त्यारे ज ते (अचल सुख) अचळ
सुख-मोक्ष (निहारै) देखे छे-पामे छे.
ते धर्म नथी एम बताववा माटे अहीं गाथामां ‘सारे’ शब्द
वापर्यो छे. ज्यारे जीव निश्चयरत्नत्रयस्वरूप धर्मने स्व-