नहि; (दुर्लभ) आवां दुर्लभ सम्यग्ज्ञानने (मुनि) मुनिराजोए
(निजमें) पोताना आत्मामां (साधौ) धारण कर्युं छे.
परंतु तेणे एक वखत पण सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर्युं नथी, कारण
के सम्यग्ज्ञान पामवुं ते अपूर्व छे, तेथी तेने तो स्व-
सन्मुखताना अनंत पुरुषार्थ वडे ज प्राप्त करी शकाय
छे. अने तेम थतां विपरीत अभिप्राय आदि दोषोनो अभाव
थाय छे.
बहारना संयोगो, चारे गति तथा लौकिक पदो अनंतवार
पाम्यो छे पण निज आत्मानुं असली स्वरूप स्वानुभववडे
प्रत्यक्ष करीने ते कदी समज्यो नथी, माटे तेनी प्राप्ति अपूर्व
छे. लौकिक कोईपण पद अपूर्व नथी.
स्वसन्मुखतापूर्वक आवुं चिंतवन करे छे, अने पोतानी बोधिनी
वृद्धिनो वारंवार अभ्यास करे छे ते बोधिदुर्लभ भावना
छे. १३.