Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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पांचमी ढाळ ][ १५३
पाम्यो, (पर) छतां (सम्यग्ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (न लाधौ) पाम्यो
नहि; (दुर्लभ) आवां दुर्लभ सम्यग्ज्ञानने (मुनि) मुनिराजोए
(निजमें) पोताना आत्मामां (साधौ) धारण कर्युं छे.
भावार्थमिथ्याद्रष्टि जीव मंद कषायने कारणे
अनेकवार ग्रैवेयक सुधी पेदा थईने अहमिन्द्र पद पाम्यो छे,
परंतु तेणे एक वखत पण सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर्युं नथी, कारण
के सम्यग्ज्ञान पामवुं ते अपूर्व छे, तेथी तेने तो स्व-
सन्मुखताना अनंत पुरुषार्थ वडे ज प्राप्त करी शकाय
छे. अने तेम थतां विपरीत अभिप्राय आदि दोषोनो अभाव
थाय छे.
सम्यग्दर्शन-ज्ञान, आत्माना आश्रये ज थाय छे. पुण्यथी,
शुभरागथी, जड कर्मादिथी थाय एवुं ते नथी. आ जीव
बहारना संयोगो, चारे गति तथा लौकिक पदो अनंतवार
पाम्यो छे पण निज आत्मानुं असली स्वरूप स्वानुभववडे
प्रत्यक्ष करीने ते कदी समज्यो नथी, माटे तेनी प्राप्ति अपूर्व
छे. लौकिक कोईपण पद अपूर्व नथी.
बोधि एटले निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी एकता; ते
बोधिनी प्राप्ति दरेक जीवे करवी जोईए. सम्यग्द्रष्टि जीव
स्वसन्मुखतापूर्वक आवुं चिंतवन करे छे, अने पोतानी बोधिनी
वृद्धिनो वारंवार अभ्यास करे छे ते बोधिदुर्लभ भावना
छे. १३.