Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 13 (Dhal 5).

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१५२ ][ छ ढाळा
तथा महादेव वगेरे कोईथी पण नष्ट करी शकातो नथी; पण
आ छ द्रव्यमय लोक छे ते पोताथी ज अनादि-अनंत छे. छ ए
द्रव्यो नित्य स्व-स्वरूपे टकीने निरंतर पोताना नवा नवा पर्यायो
(अवस्था)थी उत्पाद-व्ययरूपे परिणमन कर्या करे छे. एक
द्रव्यमां बीजा द्रव्यनो अधिकार नथी. आ छ द्रव्यस्वरूप लोक ते
मारुं स्वरूप नथी, ते माराथी त्रिकाळ भिन्न छे, हुं तेनाथी
भिन्न छुं, मारो शाश्वत चैतन्यलोक ते ज मारुं स्वरूप छे. एम
धर्मी जीव विचारे छे अने स्वसन्मुखता द्वारा विषमता मटाडी,
साम्यभाव-वीतरागता वधारवानो अभ्यास करे छे ते लोक
भावना छे. १२.
११बोधिादुर्लभ भावना
अंतिम ग्रीवकलौंकी हद, पायो अनंत विरियां पद;
पर सम्यग्ज्ञान न लाधौ; दुर्लभ निजमें मुनि साधौ. १३.
अन्वयार्थ(अंतिम) छेल्ली-नवमी (ग्रीवकलौं की हद)
ग्रैवेयक सुधीनां (पद) पद (अनंत विरियां) अनंतवार (पायो)