पांचमी ढाळ ][ १५१
निर्जरा थाय छे, त्यारे जीव शिवसुख (सुखनी पूर्णतारूप मोक्ष)
पामे छे. एम जाणतो सम्यग्द्रष्टि जीव स्वद्रव्यना आलंबन वडे
जे शुद्धिनी वृद्धि करे छे ते निर्जरा भावना छे. ११.
१० – लोक भावना
किनहू न करौ न धरै को, षड्द्रव्यमयी न हरै को;
सो लोकमांहि बिन समता, दुख सहै जीव नित भ्रमता. १२.
अन्वयार्थः — आ लोकने (किनहू) कोईए (न करौ)
बनाव्यो नथी, (को) कोईए (न धरै) टकावी राख्यो नथी, (को)
कोई (न हरै) नाश करी शकतो नथी; [अने आ लोक]
(षड्द्रव्यमयी) छ द्रव्यस्वरूप छे — छ द्रव्योथी भरेलो छे (सो)
एवा (लोकमांहि) लोकमां (विन समता) वीतरागी समता विना
(नित) हंमेशां (भ्रमता) भटकतो थको (जीव) जीव (दुख सहै)
दुःख सहन करे छे.
भावार्थः — ब्रह्मा वगेरे कोईए आ लोकने बनाव्यो नथी,
विष्णु अगर तो शेषनाग वगेरे कोईए टकावी राख्यो नथी,