Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 11 (Dhal 5).

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१५० ][ छ ढाळा
निर्जरा भावना
निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काज न सरना;
तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै. ११.
अन्वयार्थजे (निज काल) पोतपोतानी स्थिति (पाय)
पूर्ण थतां (विधि) कर्मो (झरना) खरी जाय छे (तासों) तेनाथी
(निज काज) जीवनुं धर्मरूपी कार्य (न सरना) सरतुं नथी-थतुं
नथी, पण (जो) जे [निर्जरा] (तप करि) आत्माना शुद्ध प्रतपन
द्वारा (कर्म) कर्मोनो (खिपावै) नाश करे छे [ते अविपाक अथवा
सकाम निर्जरा छे] (सोई) ते (शिवसुख) मोक्षनुं सुख (दरसावै)
देखाडे छे.
भावार्थपोतपोतानी स्थिति पूर्ण थतां कर्मोनुं खरी जवुं
तो दरेक समये अज्ञानीने पण थाय छे. ते कांई शुद्धिनुं कारण
थतुं नथी. परंतु सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र अने आत्माना शुद्ध
प्रतपन वडे जे कर्मो खरी जाय छे ते अविपाक अथवा सकाम
निर्जरा कहेवाय छे. ते प्रमाणे शुद्धिनी वृद्धि थतां थतां संपूर्ण