तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै. ११.
(निज काज) जीवनुं धर्मरूपी कार्य (न सरना) सरतुं नथी-थतुं
नथी, पण (जो) जे [निर्जरा] (तप करि) आत्माना शुद्ध प्रतपन
द्वारा (कर्म) कर्मोनो (खिपावै) नाश करे छे [ते अविपाक अथवा
सकाम निर्जरा छे] (सोई) ते (शिवसुख) मोक्षनुं सुख (दरसावै)
देखाडे छे.
थतुं नथी. परंतु सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र अने आत्माना शुद्ध
प्रतपन वडे जे कर्मो खरी जाय छे ते अविपाक अथवा सकाम
निर्जरा कहेवाय छे. ते प्रमाणे शुद्धिनी वृद्धि थतां थतां संपूर्ण